पर्सनल फाइनेंस
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3 min read | अपडेटेड September 18, 2025, 13:58 IST
सारांश
8th Pay Commission: केंद्र सरकार के 8वें वेतन आयोग को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। आयोग का गठन और ‘टर्म ऑफ रेफरेंस’ घोषित नहीं होने से कर्मचारियों में चिंता है। फिटमेंट फैक्टर 1.9–2.0 होने की उम्मीद जताई जा रही है, जिससे न्यूनतम बेसिक पे ₹34,200 से ₹36,000 तक हो सकता है।

8th Pay Commission: पेंशन हमेशा बेसिक सैलरी के आधार पर तय होती है।
8th Pay Commission: केंद्र सरकार ने इस वर्ष जनवरी में 8वें वेतन आयोग की घोषणा की थी और साफ किया था कि इसकी सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से लागू होंगी। हालांकि अब समय बेहद कम बचा है और आयोग का गठन तक नहीं हो पाया है। इससे केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनरों में असमंजस की स्थिति है। सरकार की घोषणा के बाद माना जा रहा था कि इस बार नया रिकॉर्ड बनेगा, क्योंकि पहले हर वेतन आयोग को लागू होने में दो–ढाई साल लगते थे। लेकिन अब मुश्किल यह है कि महज सौ दिन शेष हैं और अभी तक न तो आयोग का गठन हुआ है और न ही चेयरमैन या सदस्यों की नियुक्ति हुई है। ऐसे में कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सिफारिशों के समय पर लागू होने की संभावना बेहद कम है।
'नेशनल मिशन फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम भारत' के अध्यक्ष मंजीत सिंह पटेल ने बताया कि सरकार की ओर से केवल इतना कहा गया है कि आयोग के लिए जरूरी स्टाफ की भर्ती शुरू हो गई है। हालांकि सदस्यों की नियुक्ति का एलान नहीं हुआ। उनकी राय में सरकार केवल पे मेट्रिक्स और फिटमेंट फैक्टर में बदलाव करके इसे लागू कर सकती है। फिटमेंट फैक्टर पर उम्मीदें: विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर फिटमेंट फैक्टर 2.0 होता है तो न्यूनतम बेसिक वेतन ₹18,000 से बढ़कर ₹36,000 हो सकता है। वहीं 1.9 पर फिटमेंट होने की स्थिति में यह ₹34,200 होगा। सातवें वेतन आयोग के दौरान तैयार किए गए पे मेट्रिक्स में 18 लेवल हैं। संभव है कि सरकार 8वें वेतन आयोग में कुछ लेवल को मर्ज कर दे।
वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने हाल ही में आयोग के लिए 35 पदों का ब्यौरा जारी किया था और इन्हें प्रतिनियुक्ति के जरिए भरे जाने की प्रक्रिया भी शुरू हुई है। लेकिन टर्म ऑफ रेफरेंस (TOR) को लेकर अभी तक कोई स्पष्टता नहीं है। कर्मचारी संगठनों ने पहले ही सरकार को अपनी सिफारिशें भेज दी थीं, लेकिन सरकार ने अब तक TOR सार्वजनिक नहीं किया है।
कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एंड वर्कर्स के महासचिव एसबी यादव का कहना है कि वेतनमान का रिवीजन 10 साल की बजाय 5 साल में होना चाहिए। बढ़ती महंगाई को देखते हुए कर्मचारी और पेंशनभोगी लंबे अंतराल को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। इसी बीच जेसीएम (ज्वाइंट कंसल्टेटिव मशीनरी) के सचिव शिव गोपाल मिश्रा ने भी कहा है कि सरकार की चुप्पी से कर्मचारियों में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।
केवल सेवारत कर्मचारी ही नहीं, पेंशनर भी इस देरी को लेकर चिंतित हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनकी पेंशन में बढ़ोतरी होगी या नहीं और महंगाई राहत (DA/DR) का क्या होगा। फाइनेंस बिल से भी पेंशनरों की चिंताएं और बढ़ गई हैं। इतिहास गवाह है कि पिछली सरकारों को रिपोर्ट लागू करने में 18 महीने से 30 महीने तक का समय लगता रहा है। हालांकि इस बार डिजिटल व्यवस्था से कुछ काम तेजी से हो सकते हैं, लेकिन अब तक आधिकारिक अधिसूचना और सदस्यों की नियुक्ति न होने के कारण कर्मचारियों में असमंजस गहराता जा रहा है।
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