मार्केट न्यूज़

3 min read | अपडेटेड March 30, 2026, 10:00 IST
सारांश
रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए करेंसी मार्केट में पोजीशन रखने की सीमा 100 मिलियन डॉलर तय कर दी है। इस नियम के कारण बैंकों को अपनी पुरानी पोजीशन कम करनी पड़ रही है, जिससे उन्हें भारी घाटा होने की आशंका है। निफ्टी बैंक के सभी 14 और पीएसयू बैंक के सभी 12 शेयरों में आज लाल निशान में कारोबार हो रहा है।

आरबीआई के फैसले का दिख रहा असर
आज का दिन भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए बड़ी मुसीबत लेकर आया है। शेयर बाजार खुलते ही निफ्टी बैंक इंडेक्स में 1,250 अंकों की भारी गिरावट दर्ज की गई। यह बिकवाली रिजर्व बैंक यानी RBI के उस सख्त कदम के बाद आई है, जिसमें रुपये की गिरती कीमत को थामने के लिए बैंकों पर नई पाबंदियां लगाई गई हैं। पिछले शुक्रवार को भी इंडेक्स 1,200 अंक टूटा था, जिसके बाद अब निफ्टी बैंक अपने रिकॉर्ड हाई लेवल 61,764 से करीब 16.6 पर्सेंट नीचे फिसल चुका है। बाजार में मची इस खलबली का असर सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के बैंकों पर साफ दिख रहा है।
डॉलर के मुकाबले रुपये को सहारा देने के लिए आरबीआई ने एक बड़ा फैसला लिया है। शुक्रवार को मार्केट बंद होने के बाद केंद्रीय बैंक ने घोषणा की कि अब बैंक करेंसी मार्केट में अपनी टोटल पोजीशन को 100 मिलियन डॉलर तक ही सीमित रखेंगे। बैंकों को अपनी सभी पोजीशन इस लेवल तक लाने के लिए 10 अप्रैल तक का समय दिया गया है। आमतौर पर बैंकों को उनके टियर-1 कैपिटल का 25 पर्सेंट तक नेट ओपन पोजीशन रखने की छूट होती थी और ग्रॉस पोजीशन पर कोई कड़ी सीमा नहीं थी। लेकिन अब अचानक आई इस पाबंदी ने बैंकों के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है।
इस नए नियम की वजह से बैंकों को ऑनशोर और ऑफशोर दोनों मार्केट में अपनी पोजीशन को तेजी से कम करना पड़ रहा है। बैंकिंग सूत्रों के मुताबिक, करीब 40,000 करोड़ रुपये की पोजीशन को खत्म करना पड़ सकता है। अगर डॉलर और रुपये के भाव में अंतर बढ़ता है, तो इससे प्राइवेट, सरकारी और विदेशी बैंकों को लगभग 4,000 करोड़ रुपये का मार्क-टू-मार्केट यानी एमटीएम लॉस हो सकता है। चूंकि यह मार्च का महीना है और फाइनेंशियल ईयर का आखिरी हफ्ता चल रहा है, इसलिए यह घाटा सीधे बैंकों के चालू क्वार्टर के मुनाफे और उनकी बैलेंस शीट पर बुरा असर डालेगा।
बैंकिंग सेक्टर के लिए मार्च 2026 का महीना बेहद खराब साबित हो रहा है। निफ्टी बैंक इस महीने अब तक 13.6 पर्सेंट टूट चुका है, जो मार्च 2020 के बाद से इसका सबसे खराब प्रदर्शन है। सरकारी बैंकों का हाल भी कुछ ऐसा ही है, पीएसयू बैंक इंडेक्स मार्च में 16 पर्सेंट तक गिर चुका है। यह सितंबर 2020 के बाद इस इंडेक्स की सबसे बड़ी मंथली गिरावट है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि बैंक अब इस नुकसान को कम करने के लिए अपने बड़े क्लाइंट्स की मदद ले सकते हैं, क्योंकि ग्राहकों पर इस तरह की कोई पोजीशन लिमिट लागू नहीं होती है।
आरबीआई की इस सख्ती के पीछे का मुख्य उद्देश्य रुपये को और ज्यादा गिरने से बचाना है। पिछले हफ्ते डॉलर के मुकाबले रुपया 95 के करीब पहुंच गया था, लेकिन अब बैंकों द्वारा डॉलर की पोजीशन खाली करने से रुपये में मजबूती आने की उम्मीद है। बाजार के जानकारों का मानना है कि रुपया जल्द ही 93 के लेवल तक वापस आ सकता है। जेफरीज जैसी संस्थाओं का अनुमान है कि इस पूरी प्रक्रिया में बैंकों को 3,000 से 4,000 करोड़ रुपये का बड़ा हिट सहना होगा। फिलहाल निवेशकों की नजर इस बात पर है कि बैंक इस स्थिति को कैसे संभालते हैं।
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