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3 min read | अपडेटेड March 04, 2026, 15:07 IST
सारांश
पश्चिम एशिया के संकट की वजह से कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है। अगर ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो दुनिया भर के केंद्रीय बैंक लिक्विडिटी को सख्त करने की दिशा में जा सकते हैं। इसका मतलब है ऊंची ब्याज दरें और बाजार में पैसे की कमी। यही डर इस समय सोना-चांदी पर दबाव बना रहा है।

अमेरिका-इजरायल और ईरान में जंग के बावजूद सोना-चांदी पर दबाव बना हुआ है।
Gold-Silver Price: जियो-पॉलिटिकल टेंशन के बीच आमतौर पर सोने-चांदी में तेजी देखी जाती है। हालांकि अमेरिका-इजरायल और ईरान में जंग के बावजूद सोना-चांदी पर दबाव बना हुआ है। दूसरी तरफ दुनिया भर के शेयर बाजारों में इस समय जबरदस्त बिकवाली देखने को मिल रही है। पश्चिम एशिया में हालात उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से बिगड़े हैं और आम तौर पर ऐसे संकट के समय निवेशक सोना-चांदी में पैसा लगाते हैं। 2025 में शानदार रिटर्न देने के बाद अब ईरान-इजरायल और पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के बावजूद सोना और चांदी 10% से ज्यादा गिर चुके हैं।
दरअसल, सोना और चांदी की कीमतें सिर्फ युद्ध या भू-राजनीतिक संकट से तय नहीं होतीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, लिक्विडिटी, ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती और डिमांड-सप्लाई जैसे कई फैक्टर साथ-साथ काम करते हैं। 2024-25 में जो तेजी आई थी, वह मुख्य रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता, सप्लाई-डिमांड गैप और कमजोर ग्रोथ आउटलुक से प्रेरित थी। मौजूदा संकट में कहानी थोड़ी बदल गई है और महंगाई का डर एक बार फिर केंद्र में आ गया है।
पश्चिम एशिया के संकट की वजह से कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है। अगर ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो दुनिया भर के केंद्रीय बैंक लिक्विडिटी को सख्त करने की दिशा में जा सकते हैं। इसका मतलब है ऊंची ब्याज दरें और बाजार में पैसे की कमी। यही डर इस समय सोना-चांदी पर दबाव बना रहा है।
जब महंगाई बढ़ती है और केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाते हैं, तो निवेशक कम जोखिम वाले और स्थिर विकल्पों की ओर झुकते हैं। ऐसे में पैसा बॉन्ड और खासतौर पर अमेरिकी ट्रेजरीज की तरफ जाता है। जैसे-जैसे पैसा ट्रेजरीज में जाता है, डॉलर मजबूत होता है और चूंकि सोना डॉलर में ही कीमत तय करता है, इसलिए दोनों का रिश्ता उलटा होता है। डॉलर के मजबूत होने पर सोने-चांदी की कीमतों पर दबाव आना स्वाभाविक है।
यही वजह है कि हाल के दिनों में दुनिया भर के शेयर बाजार गिरे हैं, खासकर दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों में, जहां पहले पॉपुलिस्ट नीतियों से तेजी आई थी। दूसरी ओर डॉलर इंडेक्स में उछाल देखने को मिला और अमेरिकी 10-साल का बॉन्ड यील्ड कुछ ही सत्रों में ऊपर चला गया। यह साफ संकेत है कि जोखिम से बचने के लिए संस्थागत पैसा सुरक्षित बॉन्ड्स की ओर शिफ्ट हो रहा है, न कि सोना-चांदी की ओर।
अब सवाल यह है कि क्या सोना-चांदी की तेजी खत्म हो गई है? इसका जवाब न पूरी तरह हां है, न पूरी तरह ना। सोना और चांदी पहले ही मल्टी-ईयर हाई पर ट्रेड कर रहे हैं, जिससे वे ट्रेजरी यील्ड के मुकाबले ज्यादा जोखिम भरे लगते हैं। संकट के समय इन मेटल में उतार-चढ़ाव भी काफी बढ़ जाता है। इसलिए बड़े निवेशक फिलहाल ज्यादा स्थिर और कम जोखिम वाले विकल्पों में पैसा पार्क करना बेहतर समझ रहे हैं, जब तक कि पश्चिम एशिया का संकट किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाता।
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