पर्सनल फाइनेंस
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4 min read | अपडेटेड March 04, 2026, 14:41 IST
सारांश
अगर आप नौकरी के साथ फ्रीलांसिंग या पार्ट-टाइम काम से अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं, तो उस पर टैक्स देना अनिवार्य है। अक्सर लोग इस कमाई को अपनी कुल इनकम में नहीं जोड़ते, जिससे बाद में भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है। सही टैक्स स्लैब और आईटीआर फॉर्म चुनना बहुत जरूरी है।

अगर आप नौकरी के साथ फ्रीलांसिंग या पार्ट-टाइम काम से अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं, तो उस पर टैक्स देना अनिवार्य है। अक्सर लोग इस कमाई को अपनी कुल इनकम में नहीं जोड़ते, जिससे बाद में भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है। सही टैक्स स्लैब और आईटीआर फॉर्म चुनना बहुत जर
आज के समय में कई लोग अपनी रेगुलर नौकरी के साथ फ्रीलांसिंग, कंसल्टिंग या ऑनलाइन काम करके एक्स्ट्रा पैसा कमाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस साइड इनकम पर टैक्स कैसे लगता है? बहुत से लोग टैक्स का हिसाब लगाते वक्त अपनी एक्स्ट्रा कमाई को गिनते ही नहीं हैं, जो कि एक बड़ी गलती साबित हो सकती है। इनकम टैक्स के नियमों के अनुसार, आपकी हर तरह की कमाई को जोड़कर ही टैक्स का हिसाब लगाया जाता है। चाहे वह आपकी सैलरी हो या पार्ट-टाइम काम से मिला पैसा, सब पर टैक्स की देनदारी बनती है। अगर आप भी किसी गिग वर्क या फ्रीलांसिंग से जुड़े हैं, तो आपको इसके टैक्स नियमों और सही आईटीआर फॉर्म के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए ताकि फ्यूचर में किसी परेशानी से बचा जा सके।
पार्ट-टाइम इनकम पर टैक्स का सीधा सा नियम है कि आपकी सभी स्रोतों से होने वाली कमाई को एक साथ जोड़ा जाता है। यानी आपकी सालाना सैलरी और पार्ट-टाइम इनकम को मिलाकर जो टोटल पैसा बनेगा, उसी पर टैक्स की गणना होगी। उदाहरण के लिए, अगर आपकी सालाना सैलरी 12.75 लाख रुपये है और आपने फ्रीलांसिंग से 5 लाख रुपये कमाए हैं, तो आपकी कुल ग्रॉस इनकम 17.75 लाख रुपये मानी जाएगी। टैक्स की गणना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि आपकी कमाई किस तरह की है। अगर आप पार्ट-टाइम जॉब कर रहे हैं, तो इसे 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज' में दिखाया जा सकता है, जबकि फ्रीलांसिंग को 'बिजनेस या प्रोफेशन' के तहत गिना जाता है। कमीशन या गिग वर्क से हुई कमाई को भी अदर सोर्सेज या बिजनेस इनकम माना जा सकता है।
फायनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए नए टैक्स रिजीम में कुछ खास बदलाव किए गए हैं। इसमें सैलरी पर 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है, लेकिन यह केवल आपकी सैलरी वाली इनकम पर ही लागू होता है। इसके अलावा नए रिजीम में 80सी या 80डी जैसे पुराने डिडक्शन नहीं मिलते हैं। अगर हम ऊपर दिए गए उदाहरण को देखें, तो 17.75 लाख रुपये की कुल इनकम में से 75 हजार का स्टैंडर्ड डिडक्शन घटाने के बाद आपकी टैक्सेबल इनकम 17 लाख रुपये रह जाएगी। नए स्लैब के अनुसार, 4 लाख तक कोई टैक्स नहीं है, जबकि 4 से 8 लाख पर 5 पर्सेंट और इसी तरह आगे टैक्स बढ़ता जाता है। 17 लाख की इस इनकम पर आपकी कुल टैक्स लायबिलिटी करीब 1,45,600 रुपये बनेगी, जिसमें 4 पर्सेंट सेस भी शामिल है।
अपनी साइड इनकम को डिक्लेयर करने के लिए सही आईटीआर फॉर्म चुनना बहुत जरूरी है। अगर आपकी पार्ट-टाइम इनकम केवल 'अदर सोर्सेज' से है, तो आपको आईटीआर-2 (ITR-2) फॉर्म भरना होगा। वहीं, अगर आपकी कमाई फ्रीलांसिंग या किसी प्रोफेशनल बिजनेस के जरिए हो रही है, तो आपको आईटीआर-3 (ITR-3) फॉर्म का चुनाव करना चाहिए। अक्सर लोग यहीं गलती करते हैं और गलत फॉर्म भर देते हैं, जिससे इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से नोटिस आने का खतरा बढ़ जाता है। याद रखें कि आपका एंप्लॉयर केवल आपकी सैलरी पर टीडीएस काटता है, इसलिए साइड इनकम पर टैक्स मैनेज करने की जिम्मेदारी आपकी खुद की होती है। फॉर्म-16 में भी आपकी पार्ट-टाइम इनकम नहीं दिखती है, इसलिए इसे खुद से जोड़ना अनिवार्य है।
एक और जरूरी नियम एडवांस टैक्स का है जिसे अक्सर लोग भूल जाते हैं। नियम के मुताबिक, अगर आपकी कुल टैक्स देनदारी 10,000 रुपये से ज्यादा है, तो आपको एडवांस टैक्स देना अनिवार्य होता है। इसे साल के अंत में एकमुश्त चुकाने के बजाय चार किस्तों में देना होता है, जो जून, सितंबर, दिसंबर और मार्च के महीनों में आती हैं। अगर आप सही समय पर एडवांस टैक्स नहीं भरते हैं, तो आपको सेक्शन 234बी और 234सी के तहत भारी ब्याज और जुर्माना चुकाना पड़ सकता है। आज के दौर में अपनी किसी भी इनकम को छुपाना बहुत जोखिम भरा है क्योंकि एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट यानी एआईएस (AIS) के जरिए इनकम टैक्स विभाग आपकी लगभग हर तरह की कमाई को ट्रैक कर लेता है।
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