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रिकॉर्ड गिरावट के साथ ऑल-टाइम लो पर पहुंचा रुपया, जानिए आपकी जेब पर क्या होगा इसका असर?

विकास तिवारी

3 min read | अपडेटेड May 20, 2026, 10:07 IST

सारांश

घरेलू बाजार में डॉलर की बढ़ती मजबूती, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और ग्लोबल अनिश्चितता के कारण भारतीय रुपया मंगलवार को ऑल-टाइम लो पर खुला। रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड 96.85 के स्तर पर आ गया है। यह लगातार 13वां कैलेंडर दिन है जब रुपए में गिरावट देखी गई है।

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अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है।

भारतीय करेंसी रुपए में गिरावट का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मंगलवार को शुरुआती कारोबार के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने ऑल-टाइम लो यानी अब तक के सबसे निचले लेवल 96.85 पर खुला। दुनिया भर के बाजारों में मची उथल-पुथल, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और डॉलर की लगातार मजबूती के चलते घरेलू करेंसी पर जोखिम और दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। यह लगातार 13वां कैलेंडर दिन है जब रुपए की कीमत में कमजोरी और गिरावट देखी गई है, जिसने भारतीय बाजार और निवेशकों की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। लगातार हो रही इस गिरावट से बाजार का सेंटिमेंट भी काफी प्रभावित हो रहा है।

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शुरुआती कारोबार में ही टूट गया रुपया

बाजार खुलने के तुरंत बाद रुपए की स्थिति और ज्यादा खराब हो गई तथा यह डॉलर के मुकाबले शुरुआती कारोबार में ही लुढ़ककर 96.93 के स्तर तक चला गया था। इससे पहले पिछले शुक्रवार को ही रुपया पहली बार 96 के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचा था। करेंसी特色 मार्केट के एक्सपर्ट्स और ट्रेडर्स के मुताबिक, रुपए की इस लगातार जारी कमजोरी को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई ने बाजार में सीधा दखल दिया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई रुपए की इस कमजोरी को रोकने के लिए बाजार में बड़े पैमाने पर डॉलर की बिक्री कर रहा है ताकि घरेलू करेंसी को एक बहुत बड़े क्रैश से बचाया जा सके, लेकिन वैश्विक दबाव के आगे रुपया संभल नहीं पा रहा है।

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 2007 के बाद सबसे ऊपर

रुपए में आई इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे एक बड़ा कारण अमेरिकी बॉन्ड बाजार में आई जबरदस्त तेजी भी माना जा रहा है। मंगलवार को 30 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 5.18 पर्सेंट पर पहुंच गई, जो साल 2007 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस यानी वैश्विक आर्थिक मंदी की शुरुआत के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है। लंबी अवधि के कर्ज के बाजार में हो रही इस चौतरफा बिकवाली ने बॉन्ड यील्ड को काफी ऊपर धकेल दिया है। जैसा कि बाजार का नियम है, बॉन्ड की कीमतें गिरने पर उसकी यील्ड काफी बढ़ जाती है। इसके साथ ही 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी की यील्ड भी बढ़कर 4.66 पर्सेंट पर पहुंच गई है, जो पिछले एक साल से भी ज्यादा समय में इसका सबसे ऊंचा स्तर है।

महंगाई और मिडिल ईस्ट के तनाव ने बढ़ाई मुश्किल

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर में आ रही इस तेज उछाल के पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निवेशकों की बढ़ती चिंताएं और घबराहट काम कर रही है। बाजार में लगातार बनी हुई जिद्दी महंगाई, कच्चे तेल की लगातार ऊंची होती कीमतें और अमेरिकी सरकार के बढ़ते बजट घाटे ने निवेशकों को चिंता में डाल दिया है। इसके साथ ही मिडिल ईस्ट यानी मध्य पूर्व में जारी तनाव ने कच्चे तेल के बाजार में अस्थिरता को और ज्यादा भड़काने का काम किया है। तेल की कीमतों में आ रहे इस उतार-चढ़ाव से दुनिया भर के बाजारों में एनर्जी से संचालित होने वाली महंगाई बढ़ने का बड़ा डर पैदा हो गया है, जिसका खामियाजा रुपए को उठाना पड़ रहा है।

लेखकों के बारे में

विकास तिवारी
Vikash Tiwary is a finance journalist with 6+ years of newsroom experience. He is currently growing Upstox Hindi, crafting data-driven stories on stocks, personal finance, mutual funds, and global markets, while exploring how AI can simplify finance. His work spans Zee Business, TV9 Bharatvarsh, ABP News, India TV, and Inshorts. He also holds NISM certification.

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