पर्सनल फाइनेंस
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3 min read | अपडेटेड November 24, 2025, 16:11 IST
सारांश
नए लेबर कोड लागू होने के बाद कंपनियों ने कर्मचारियों के सैलरी स्ट्रक्चर में बदलाव करना शुरू कर दिया है। अब 'वेज' की परिभाषा बदल गई है, जिसका सीधा असर आपके पीएफ और ग्रेच्युटी पर पड़ेगा। नए नियमों के मुताबिक अलाउंस कुल सैलरी का 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकते।

नए लेबर कोड से सैलरी स्ट्रक्चर में हो रहे बदलाव को समझें।
नए लेबर कोड आने के बाद से ही कई कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के सैलरी स्ट्रक्चर को बदलना शुरू कर दिया है। कोड ऑन वेजेज और सोशल सिक्योरिटी कोड के प्रावधानों के तहत सांविधिक लाभों (Statutory Benefits) को एडजस्ट किया जा रहा है। इन बदलावों के कारण कर्मचारियों को अपने प्रोविडेंट फंड यानी पीएफ, ग्रेच्युटी और कुछ मामलों में महीने की इन-हैंड सैलरी में अंतर देखने को मिल सकता है। नौकरीपेशा लोगों के लिए इन तकनीकी बदलावों को समझना बेहद जरूरी है ताकि वे अपनी फाइनेंशियल प्लानिंग सही तरीके से कर सकें।
इस नए ढांचे की सबसे बड़ी खासियत 'वेज(wages)' है। अब इसमें बेसिक पे, डियरनेस अलाउंस (DA) और रिटेनिंग अलाउंस को शामिल किया गया है। नियम के मुताबिक, एचआरए, कन्वेयंस, एंप्लॉयर का पीएफ योगदान या कमीशन जैसे जो भत्ते (Allowances) बाहर रखे जाते थे, वे अब कुल पारिश्रमिक के 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकते। अगर ये भत्ते 50 फीसदी से ज्यादा होते हैं, तो अतिरिक्त राशि को सांविधिक लाभों की गणना के लिए 'वेज' में वापस जोड़ दिया जाएगा। अकॉर्ड ज्यूरिस के मैनेजिंग पार्टनर अलय रिजवी बताते हैं कि इसका मतलब है कि पीएफ और ग्रेच्युटी जैसी कटौती के लिए इस्तेमाल होने वाला बेस फिगर बढ़ जाएगा। कानून नियोक्ताओं को बेसिक सैलरी बढ़ाने के लिए मजबूर नहीं करता, लेकिन गणना नए वेज बेस पर ही करनी होगी।
पीएफ योगदान की दर 12 फीसदी ही रहेगी और अनिवार्य पीएफ के लिए 15,000 रुपये की मासिक वेतन सीमा भी जारी रहेगी। जिन कर्मचारियों का बेसिक और डीए पहले से ही 15,000 रुपये से ऊपर है, उन्हें कोई बदलाव नहीं दिखेगा। हालांकि, जो लोग इस सीमा से नीचे हैं, उनका पीएफ बेस थोड़ा बढ़ सकता है अगर उनका अधिक वेतन अब 'वेज' के दायरे में आता है। वहीं ग्रेच्युटी में ज्यादा बदलाव दिखेगा क्योंकि इसकी गणना अब व्यापक वेज परिभाषा पर की जाएगी। कई कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी का प्रभावी बेस सीटीसी के करीब आधे तक बढ़ने की संभावना है, जिससे नौकरी छोड़ने पर मिलने वाली राशि (Exit Payouts) ज्यादा होगी।
फिक्स्ड टर्म और परमानेंट कर्मचारी के बीच मुख्य अंतर रोजगार की अवधि और स्थिरता का है। बीएस की रिपोर्ट में सिंघानिया एंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर रोहित जैन कहते हैं कि ये खबरें गलत हैं कि हर कर्मचारी को अब एक साल बाद ग्रेच्युटी मिलेगी। परमानेंट कर्मचारियों के लिए अभी भी पांच साल का नियम ही लागू है। नया एक साल वाला नियम केवल फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए फायदेमंद है। फिक्स्ड टर्म कर्मचारी वे होते हैं जिन्हें किसी विशेष अवधि या प्रोजेक्ट के लिए रखा जाता है।
हाथ में आने वाली सैलरी कम होना संभव है, लेकिन यह अपने आप नहीं होगा। जानकारों के मुताबिक, ज्यादा वेज बेस का मतलब है ज्यादा सांविधिक योगदान। अगर नियोक्ता यानी कंपनी सकल वेतन (Gross Pay) बढ़ाए बिना पूरा बोझ कर्मचारी पर डाल देती है, तो टेक-होम सैलरी कम हो जाएगी। हालांकि, कंपनियां प्रभाव को कम करने के लिए भत्तों को फिर से पुनर्गठित (Restructure) कर सकती हैं। एंप्लॉयर्स को पिछले वर्षों के पीएफ या ग्रेच्युटी योगदान में किसी भी कमी को वसूलने की आवश्यकता नहीं है। 21 नवंबर 2025 के बाद नौकरी छोड़ने वालों के लिए ग्रेच्युटी पेआउट बढ़ने की उम्मीद है। नए लेबर कोड का मकसद एकरूपता लाना और सोशल सिक्योरिटी का विस्तार करना है, जिससे रिटायरमेंट सेविंग मजबूत होगी, भले ही इससे कुछ कर्मचारियों का मासिक बजट थोड़ा टाइट हो जाए।
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