पर्सनल फाइनेंस
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4 min read | अपडेटेड January 08, 2026, 15:04 IST
सारांश
म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय डायरेक्ट और रेगुलर प्लान का चुनाव आपकी कुल संपत्ति पर बड़ा असर डालता है। रेगुलर प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन शामिल होता है, जो खर्च अनुपात को बढ़ा देता है। यह छोटा सा दिखने वाला कमीशन समय के साथ जुड़कर आपके भविष्य के फंड को कम कर सकता है।

म्यूचुअल फंड के डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के बीच एक खास अंतर होता है।
म्यूचुअल फंड में निवेश करना संपत्ति बनाने का एक बेहतरीन जरिया है, लेकिन निवेश के तरीके में एक छोटी सी चूक आपकी मेहनत की कमाई पर भारी पड़ सकती है। 1 फाइनेंस रिसर्च की एक नई स्टडी ने इस बात का खुलासा किया है कि रेगुलर म्यूचुअल फंड प्लान में छिपे हुए कमीशन निवेशकों की लंबी अवधि की संपत्ति को धीरे-धीरे खत्म कर रहे हैं। अध्ययन के अनुसार, पिछले एक दशक में ज्यादातर निवेशकों ने अपने संभावित मुनाफे का एक चौथाई हिस्सा सिर्फ इन छिपे हुए कमीशनों की वजह से खो दिया है। यह रिपोर्ट उन लोगों के लिए आंखें खोलने वाली है जो बिना समझे रेगुलर प्लान में पैसा लगा रहे हैं और यह मान रहे हैं कि उन्हें पूरा फायदा मिल रहा है।
अध्ययन की रिपोर्ट में बताया गया है कि 10 साल की अवधि के दौरान 80 प्रतिशत से अधिक इक्विटी म्यूचुअल फंड योजनाओं ने रेगुलर प्लान के निवेशकों को डायरेक्ट प्लान की तुलना में कम से कम 25 प्रतिशत कम संपत्ति दी है। लगभग पांच में से एक स्कीम में तो यह अंतर 50 प्रतिशत से भी अधिक देखा गया है। यह बड़ा अंतर केवल रेगुलर प्लान में शामिल एक्सपेंस रेशियो के कारण होता है। हालांकि दोनों प्लान का पोर्टफोलियो और निवेश की जाने वाली कंपनियां बिल्कुल एक जैसी होती हैं, लेकिन रेगुलर प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर को दिया जाने वाला कमीशन आपके रिटर्न को हर साल कम करता रहता है।
1 फाइनेंस ने अपनी इस स्टडी में एम्फी के डेटा का उपयोग किया है और डायरेक्ट-ग्रोथ और रेगुलर-ग्रोथ विकल्पों की तुलना की है। अध्ययन में फ्लेक्सी-कैप, लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल-कैप जैसी प्रमुख कैटेगरी के एक्टिव फंड्स का विश्लेषण किया गया है। आंकड़ों से पता चलता है कि 10 साल पुरानी 243 स्कीम्स में से 194 स्कीम्स ने रेगुलर प्लान वाले निवेशकों को 25 प्रतिशत कम मुनाफा दिया है। यह गिरावट केवल लंबे समय में ही नहीं, बल्कि कम अवधि में भी साफ दिखाई देती है। 5 साल पुरानी योजनाओं में भी 53 प्रतिशत स्कीम्स ने खर्चों की वजह से मुनाफे में 15 प्रतिशत का अंतर दिखाया है।
रिपोर्ट में एक बहुत ही अजीब विरोधाभास सामने आया है। आंकड़ों के अनुसार, रेगुलर प्लान के निवेशक अक्सर डायरेक्ट प्लान के निवेशकों की तुलना में अधिक समय तक निवेशित रहते हैं। जहां रेगुलर प्लान के 21.2 प्रतिशत निवेशक 5 साल से ज्यादा समय तक अपना पैसा लगाए रखते हैं, वहीं डायरेक्ट प्लान में यह संख्या केवल 7.7 प्रतिशत है। आम तौर पर लंबे समय तक निवेश करने से कंपाउंडिंग का फायदा मिलता है और संपत्ति बढ़ती है, लेकिन रेगुलर प्लान में लगा कमीशन का बोझ इस फायदे को उल्टा कर देता है। यानी निवेशक जितना ज्यादा समय तक टिका रहता है, उसका उतना ही ज्यादा पैसा कमीशन की भेंट चढ़ जाता है।
डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के बीच का अंतर बहुत ही सीधा है। जब आप किसी म्यूचुअल फंड हाउस की वेबसाइट या दफ्तर से सीधे निवेश करते हैं, तो उसे 'डायरेक्ट प्लान' कहा जाता है। इसमें आपके और कंपनी के बीच कोई एजेंट नहीं होता, इसलिए कंपनी को किसी को कमीशन नहीं देना पड़ता। इसका पूरा फायदा आपके मुनाफे में जुड़ता है। दूसरी ओर, जब आप किसी एजेंट, बैंक या डिस्ट्रीब्यूटर के जरिए निवेश करते हैं, तो उसे 'रेगुलर प्लान' कहते हैं। इसमें आपके निवेश से हर साल एक निश्चित हिस्सा एजेंट को कमीशन के तौर पर दिया जाता है। चूंकि दोनों प्लान का पोर्टफोलियो एक ही होता है, इसलिए केवल इस कमीशन की वजह से रेगुलर प्लान का खर्च ज्यादा हो जाता है और आपका शुद्ध मुनाफा कम हो जाता है।
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