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4 min read | अपडेटेड January 22, 2026, 13:55 IST
सारांश
क्या आप जानते है कि भारत में पहली बार इनकम टैक्स कब लगा था? अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ टैक्स का यह सफर आज डिजिटल इंडिया और फेसलेस असेसमेंट तक पहुंच गया है। बजट 2026 से पहले आइए जानते है कि आजादी के बाद से अब तक हमारे टैक्स सिस्टम में क्या बडे बदलाव हुए है।

पिछले कुछ दशकों में टैक्स में कैसे बदलाव हुए हैं।
भारत में जब भी बजट पेश होने वाला होता है, तो आम आदमी और नौकरीपेशा वर्ग की नजरें सबसे पहले इनकम टैक्स स्लैब पर जाकर टिक जाती है। हर किसी को उम्मीद होती है कि सरकार टैक्स में कुछ कटौती करेगी या छूट की सीमा बढ़ाएगी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस इनकम टैक्स को लेकर आज इतनी चर्चा होती है, उसकी शुरुआत कैसे हुई थी? भारत में इनकम टैक्स का इतिहास काफी दिलचस्प और पुराना है। इसकी जडें आजादी से भी बहुत पहले की है। समय के साथ न केवल टैक्स वसूलने के तरीके बदले, बल्कि इससे होने वाली कमाई का आंकड़ा भी आसमान छूने लगा है।
भारत में इनकम टैक्स की नींव साल 1860 में रखी गई थी। उस समय देश में अंग्रेजों का शासन था और सर जेम्स विल्सन ने पहली बार इसे लागू किया था। शुरुआती दौर में यह टैक्स केवल अमीर लोगों पर लगाया गया था, जिसकी वजह से उस समय के संपन्न वर्ग में काफी नाराजगी भी देखी गई थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि टैक्स लागू होने के पहले साल में सरकार को केवल 30 लाख रुपये की आय हुई थी। इसके बाद साल 1865 में इस कानून को खत्म कर दिया गया, लेकिन 1867 में इसे फिर से एक नए रूप में लाया गया। उस समय यह इनकम टैक्स और लाइसेंस टैक्स का मिला-जुला रूप था। धीरे-धीरे टैक्स से होने वाली कमाई बढ़ने लगी और 1886 तक यह आंकड़ा 1.36 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान संसाधनों की कमी को पूरा करने के लिए साल 1917 में पहली बार सुपर टैक्स जैसा प्रावधान लाया गया था।
15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ, तो देश के सामने अपनी अर्थव्यवस्था को खड़ा करने की बडी चुनौती थी। आजादी के तुरंत बाद साल 1947 में ही बिजनेस प्रॉफिट टैक्स लागू किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य युद्ध के समय कंपनियों द्वारा की गई अतिरिक्त कमाई पर टैक्स लगाना था। इसके बाद 1951 में टैक्स चोरी रोकने के लिए स्वैच्छिक घोषणा योजना लाई गई। साल 1957 में वेल्थ टैक्स और 1958 में गिफ्ट टैक्स जैसे कानून बनाकर अमीरों की संपत्ति और उपहारों को टैक्स के दायरे में लाया गया। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव साल 1961 में आया, जब इनकम टैक्स एक्ट 1961 बनाया गया। यह कानून आज भी भारत में टैक्स व्यवस्था का मुख्य आधार है। इसके बाद 1963 में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी सीबीडीटी का गठन हुआ, जिसने टैक्स प्रशासन को एक नई दिशा दी।
जैसे-जैसे देश आगे बढ़ा, टैक्स व्यवस्था को सरल और पारदर्शी बनाने की कोशिशें तेज हो गईं। साल 1972 में परमानेंट अकाउंट नंबर यानी PAN सिस्टम की शुरुआत की गई, ताकि टैक्सपेयर्स पर नजर रखी जा सके। 1982 में विभाग के कामकाज में कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू हुआ, जिससे डेटा रखना आसान हो गया। 1990 के दशक में भी कई अहम सुधार हुए। साल 1997 में टैक्स की दरों में भारी कटौती की गई और विवादों को सुलझाने के लिए नई योजनाएं लाई गईं। साल 2004 में सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स और 2006 में ई-फाइलिंग प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई। इन बदलावों ने आम आदमी के लिए टैक्स भरना पहले के मुकाबले काफी आसान बना दिया।
साल 2014 के बाद से टैक्स सिस्टम में बडे बदलाव देखने को मिले। साल 2020 में सरकार ने न्यू इनकम टैक्स रिजीम की शुरुआत की, जिसने टैक्स देने का एक नया विकल्प दिया। साल 2023 के बजट में न्यू टैक्स रिजीम के तहत 7 लाख रुपये तक की आय को टैक्स फ्री कर दिया गया। इसके बाद 2024 में स्टैंडर्ड डिडक्शन को बढ़ाकर 75 हजार रुपये किया गया। साल 2025 के बजट में सरकार ने और बड़ी राहत देते हुए न्यू टैक्स रिजीम में 12 लाख रुपये तक की आय पर रिबेट के साथ टैक्स छूट की सीमा तय कर दी। साथ ही बेसिक छूट की सीमा को भी 3 लाख से बढ़ाकर 4 लाख रुपये कर दिया गया। इस तरह 30 लाख रुपये से शुरू हुआ यह सफर आज करोड़ों टैक्सपेयर्स और लाखों करोड़ रुपये के कलेक्शन तक पहुंच गया है।
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