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4 min read | अपडेटेड January 18, 2026, 13:46 IST
सारांश
म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय केवल रिटर्न देखना भारी पड़ सकता है। वित्तीय आजादी की राह में छह पैमाने बहुत जरूरी होते हैं, जिससे यह पता लग पाता है कि कोई म्यूचुअल फंड रिस्क और रिटर्न के तराजू पर कैसा दिखता है।

म्यूचुअल फंड में नई SIP करते वक्त जानें किन बातों का ध्यान रखना है जरूरी
शेयर बाजार और इक्विटी म्यूचुअल फंड को लंबे समय में महंगाई को मात देने वाले निवेश के रूप में देखा जाता है। हालांकि, बाजार से पैसा कब निकालना है और कब तक बने रहना है, यह आपके कुल मुनाफे को तय करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। ऐतिहासिक आंकड़ों को देखें तो इक्विटी बाजार ने हमेशा उन धैर्यवान निवेशकों को बड़ा इनाम दिया है जो अनुशासन के साथ निवेशित रहे। अक्सर हम सभी अपनी संपत्ति बढ़ाने की उम्मीद में म्यूचुअल फंड में पैसा लगाते हैं, लेकिन हममें से बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि उन आंकड़ों के पीछे की असली कहानी क्या है। इसलिए अगर आप किसी म्यूचुअल फंड में नई SIP करने की सोच रहे हैं तो आपको आज यह जान लेना चाहिए कि बेहतर म्यूचुअल फंड का चुनाव करते वक्त किन बातों का ध्यान रखना होता है।
जब कोई नया निवेशक म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने का मन बनाता है, तो वह सबसे पहले फंड के पिछले रिटर्न देखता है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन रिटर्न कभी भी पूरी तस्वीर पेश नहीं करते हैं। मुमकिन है कि दो अलग-अलग फंड एक जैसा रिटर्न दे रहे हों, लेकिन उनमें से एक फंड दूसरे की तुलना में बहुत ज्यादा जोखिम भरा हो। यहीं पर तकनीकी रेशियो की भूमिका शुरू होती है। ये आंकड़े आपको केवल अनुमान लगाने के बजाय समझदारी और आत्मविश्वास के साथ निवेश करने में मदद करते हैं। इनमें बीटा, स्टैंडर्ड डेविएशन, अल्फा, शार्प रेशियो, इंफॉर्मेशन रेशियो और एक्सपेंस रेशियो सबसे प्रमुख माने जाते हैं।
बीटा एक ऐसा आंकड़ा है जो बताता है कि आपका फंड बाजार की चाल के साथ कितनी करीब से चलता है। अगर बीटा एक के बराबर है, तो फंड बाजार की तरह ही व्यवहार करेगा। एक से ज्यादा बीटा का मतलब है कि फंड बाजार से ज्यादा तेज ऊपर-नीचे होगा, जबकि एक से कम बीटा स्थिरता का संकेत देता है। यदि किसी फंड का जोखिम बेंचमार्क से ज्यादा है, तो उसे रिटर्न भी ज्यादा देना चाहिए। वहीं, स्टैंडर्ड डेविएशन यह बताता है कि फंड के रिटर्न में कितना उतार-चढ़ाव होता है। कम उतार-चढ़ाव वाले फंड में निवेश करना आसान होता है क्योंकि इसमें अचानक बड़ी गिरावट का डर कम रहता है, जिससे निवेशक लंबे समय तक टिके रह सकते हैं।
अल्फा रेशियो यह बताता है कि फंड मैनेजर अपने स्किल से बाजार के मुकाबले कितना अतिरिक्त फायदा पहुंचा रहा है। यदि अल्फा पॉजिटिव है, तो इसका मतलब है कि मैनेजर ने अपनी रणनीति से अच्छा मूल्य जोड़ा है। वहीं, शार्प रेशियो यह बताता है कि आपके द्वारा लिए गए जोखिम के बदले मिलने वाला इनाम कितना सही है। इसे 1966 में अर्थशास्त्री विलियम एफ शार्प ने तैयार किया था। ज्यादा शार्प रेशियो का मतलब है कि फंड ने जोखिम की हर इकाई के लिए बेहतर प्रदर्शन किया है। निवेशकों को हमेशा उन फंडों को प्राथमिकता देनी चाहिए जिनका अल्फा और शार्प रेशियो लगातार अच्छा बना रहता है।
इंफॉर्मेशन रेशियो यह बताता है कि कोई फंड अपने बेंचमार्क जैसे निफ्टी या सेंसेक्स की तुलना में कितनी निरंतरता के साथ अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। सेबी के जनवरी 2025 के नए नियमों के अनुसार, अब सभी इक्विटी फंडों के लिए अपनी वेबसाइट पर इस रेशियो को दिखाना जरूरी कर दिया गया है। यह नियम अप्रैल 2025 से लागू हो चुका है ताकि निवेशक फंडों की तुलना आसानी से कर सकें। अंत में, एक्सपेंस रेशियो पर ध्यान देना बहुत जरूरी है, जो फंड के मैनेजमेंट और उसके ऑपरेशन की सालाना लागत होती है। यह लागत जितनी कम होगी, निवेशक का शुद्ध मुनाफा उतना ही ज्यादा होगा।
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