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4 min read | अपडेटेड June 11, 2025, 07:50 IST
सारांश
IPO Guide: कंपनियों को बिजनेस करने के लिए कैपिटल चाहिए होता है और इसको हासिल करने का एक तरीका है आईपीओ यानी Initial Public Offerin, IPO जिसके जरिए आम आदमी भी कंपनी का शेयरधारक बन सकता है। कंपनी के शेयर्स अलॉट होने के बाद ये स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होती है। यहां से शेयर्स की ओपन मार्केट ट्रेडिंग शुरू हो जाती है।

आईपीओ में निवेश करने से कंपनियों को कैपिटल तो मिलता ही है, निवेशकों को लॉन्ग-टर्म में भी फायदा मिल सकता है।
जैसा कि पहले बताया गया है कि आईपीओ का मतलब है Initial Public Offering यानी प्राइमरी मार्केट में सिक्यॉरिटीज की पब्लिक सेल। इसके जरिए कंपनी की हिस्सेदारी हासिल की जाती है जो कई शेयर्स में बंटी होती है। ये नए शेयर्स बनाकर या प्रमोटर्स के हिस्से को सेल पर लगाकर किया जा सकता है।
इन शेयर्स पर बोली लगाई जाती है जिससे निवेशकों के बीच कंपनी को लेकर रुझान का अंदाजा भी लगता है। कंपनी को निवेशकों से कैपिटल जुटाने में आईपीओ काम आते हैं। स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने के बाद कंपनी के शेयर्स को ओपन मार्केट में आराम से ट्रेड किया जा सकता है। निवेशकों को डिविडेंड, हिस्सेदारी की बिक्री वगैरह के जरिए अपने निवेश पर प्रॉफिट मिल सकता है।
कंपनी के शेयर्स को किसी भी वक्त खरीदने या बेचने की आजादी होती है जिससे निवेशक का कैपिटल फंसा नहीं रहता। सेकंडरी मार्केट में लिस्ट होने के साथ ही निवेशक इनकी ओपन मार्केट में ट्रेडिंग शुरू कर सकते हैं।
आईपीओ में जिन निवेशकों को शेयर अलॉट होते हैं वे कंपनी के शेयरधारक हो जाते हैं। कंपनी की कोशिश रहती है कि ये शेयरधारक उसके साथ जुड़े रहें। इसलिए वह अपने प्रॉफिट टारगेट्स हासिल करने की कोशिश में रहती है।
यह कंपनी के स्टॉक मूवमेंट में रिफ्लेक्ट होता है। शेयरधारकों को कंपनी की सालाना रिपोर्ट्स भी मिलती है जिससे वे कंपनी की परफॉर्मेंस की समीक्षा कर सकते हैं।
आईपीओ में निवेश से खुदरा निवेशकों को कम कीमत पर कंपनी का हिस्सा बनने का मौका मिल सकता है जिससे आने वाले समय में प्रॉफिट बढ़ सकता है। पहली बार लिस्ट होने जा रही कंपनी के ग्रोथ के चांस भी ज्यादा होते हैं जिससे शेयरधारकों को फायदा होने की संभावना भी बढ़ती है।
आईपीओ के प्रोसेस को SEBI (सिक्यॉरिटीज ऐंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) मॉनिटर करता है। इसलिए ये सुरक्षित और प्रफेशनल होते हैं। खासकर खुदरा निवेशकों के हितों की रक्षा करने पर सेबी का फोकस रहता है।
इस इक्विटी इन्वेस्टमेंट में निवेश से पोर्टफोलियो बैलेंस होता है। इनमें रिटर्न ज्यादा होता है, खासकर तब जब लंबे वक्त के लिए इन्हें रखा जाए। कंपनी के शेयर्स रखने से डिविडेंड या प्रॉफिट होने पर शेयरधारकों को भी फायदा मिलता है।
निवेश के पहले मार्केट, कंपनी के बारे में पूरी रिसर्च करें। सिर्फ उसकी प्रॉसपेक्टस के सहारे फैसला ना करें। उसकी पिछली परफॉर्मेंस, प्रेस रिलीज जैसे दस्तावेजों को स्टडी करें, इंडस्ट्री का ओवरऑल रुख समझें।
यह समझना जरूरी है कि कंपनी के प्रमोटर्स की परफॉर्मेंस कैसी है, वे कैसे फैसले करते हैं, किसी पुराने बैंक लोन पर डिफॉल्ट तो नहीं है।
प्री-आईपीओ स्टॉक्स के शेयर्स लॉक-इन पीरियड के दौरान बेचे नहीं जा सकते। इस दौरान यह स्टडी किया जा सकता है कि स्टॉक मुनाफा देने वाला है या नहीं। अगर लॉक इन पीरियड के बाद भी स्टॉक नहीं बिक रहे हैं, तो उसके आईपीओ में निवेश किया जा सकता है।
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