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6 min read | अपडेटेड July 06, 2026, 16:19 IST
सारांश
रिलायंस जियो का आईपीओ अब हकीकत बनने के बेहद करीब है। जियो प्लेटफॉर्म्स ने सेबी के पास आईपीओ के लिए ड्राफ्ट पेपर्स जमा करा दिए हैं। ड्राफ्ट पेपर्स से कंपनी के शेयरहोल्डिंग पैटर्न को लेकर बेहद दिलचस्प बातें सामने आई हैं, जिसके मुताबिक रिलायंस और मेटा के बाद दिग्गज टेक कंपनी गूगल (Google) इसमें तीसरी सबसे बड़ी शेयरहोल्डर है।

जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को लेकर निवेशकों और बाजार में भारी उत्साह।
साल 1973 में धीरुभाई अंबानी और उनके बड़े बेटे मुकेश अंबानी ने मिलकर 'माइनायलॉन लिमिटेड' की नींव रखी थी, जो आगे चलकर मार्केट कैपिटलाइजेशन के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी निजी क्षेत्र की कंपनी बनी और आज इसे हम रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के नाम से जानते हैं। पेट्रोकेमिकल्स और रिफाइनिंग से शुरू हुआ यह सफर आज रीन्यूएबल्स, रिटेल और डिजिटल सर्विसेज तक फैल चुका है। साल 2016 में देश के टेलीकॉम सेक्टर में तहलका मचाने वाली रिलायंस जियो इंफोकॉम की पैरेंट कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड (JPL) अब अपने इतिहास के सबसे बड़े मील के पत्थर के करीब पहुंच गई है। कंपनी ने मार्केट रेगुलेटर सेबी (SEBI) के पास अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रोस्पेक्टस (DRHP) जमा कर दिया है। इस ड्राफ्ट पेपर के सामने आने के बाद कंपनी के शेयरहोल्डिंग पैटर्न से लेकर इसके बिजनेस मॉडल में छिपे बड़े रिस्क फैक्टर्स की पूरी इनसाइड स्टोरी बाहर आ गई है।
भले ही जियो प्लेटफॉर्म्स में दुनिया के कई बड़े और हाई-प्रोफाइल ग्लोबल इनवेस्टर्स ने भारी निवेश किया हुआ है, लेकिन रिलायंस इंडस्ट्रीज ही इस कंपनी की एकमात्र प्रमोटर बनी हुई है। प्रमोटर के तौर पर रिलायंस के पास कंपनी के कुल 593.78 करोड़ इक्विटी शेयर्स हैं, जो आईपीओ से पहले की कुल पेड-अप इक्विटी शेयर कैपिटल का 66.43% हिस्सा है। DRHP दाखिल होने की तारीख तक कंपनी के पास कुल 105 शेयरहोल्डर्स मौजूद हैं। अगर बड़े निवेशकों की बात करें, तो फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा की सहयोगी इकाई यानी जादू होल्डिंग्स 9.98% हिस्सेदारी के साथ दूसरे नंबर पर है। इसके ठीक बाद वैश्विक टेक दिग्गज गूगल इंटरनेशनल LLC 7.73% हिस्सेदारी के साथ जियो प्लेटफॉर्म्स में तीसरी सबसे बड़ी शेयरहोल्डर के रूप में सामने आई है। इसके अलावा सऊदी अरब का पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड, केकेआर की अफिलिएट ओमिक्रॉन एशिया और विस्टा इक्विटी प्रत्येक के पास 2.31% हिस्सेदारी मौजूद है, जबकि शीर्ष 10 शेयरहोल्डर्स मिलकर कंपनी का कुल 97.32% हिस्सा कंट्रोल करते हैं।
31 मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, जियो प्लेटफॉर्म्स भारत के वायरलेस ब्रॉडबैंड मार्केट में कुल 50% की एकतरफा बाजार हिस्सेदारी रखता है और देश के कुल वायरलेस डेटा ट्रैफिक का लगभग 60% हिस्सा अकेले जियो के नेटवर्क से होकर गुजरता है। वित्तीय मोर्चे पर भी कंपनी लगातार दमदार मुनाफा कमा रही है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में कंपनी का ऑपरेशन्स रेवेन्यू 1,09,558.10 करोड़ रुपये था, जो अगले साल यानी वित्तीय वर्ष 2024-25 में बढ़कर 1,28,218.40 करोड़ रुपये हो गया। वहीं हालिया वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा 1,46,885.30 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। इसी तरह कंपनी का शुद्ध मुनाफा भी लगातार बढ़ रहा है। साल 2024 के 21,423.20 करोड़ रुपये के मुकाबले साल 2025 में यह 26,109 करोड़ रुपये और साल 2026 में 30,049.10 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है, जिससे इसका प्रॉफिट मार्जिन भी मजबूत होकर 20.46% पर पहुंच गया है।
इस DRHP के सामने आने के बाद बाजार के जानकारों के सामने एक बेहद दिलचस्प सवाल खड़ा हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, जहां एक तरफ कंपनी का मुनाफा लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ पिछले तीन सालों से कंपनी का कैश केपेक्स यानी पूंजीगत खर्च लगातार घट रहा है। साल 2024 में जहां कंपनी का कैश केपेक्स 53,510 करोड़ रुपये था, वह 2025 में घटकर 44,268 करोड़ रुपये और 2026 में और कम होकर 34,184 करोड़ रुपये रह गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि कंपनी भारी मात्रा में फ्री कैश जनरेट कर रही है और उस पर निवेश का कोई तात्कालिक दबाव या फंडिंग इमरजेंसी नहीं है। इसके बावजूद रिलायंस पूरी तरह से 27 करोड़ शेयरों का फ्रेश इश्यू लाकर यह आईपीओ इसलिए ला रही है ताकि जियो खुद को सिर्फ एक टेलीकॉम कनेक्टिविटी प्रोवाइडर से बदलकर एक ग्लोबल एआई-नेटिव डिजिटल सर्विसेज कंपनी के रूप में स्थापित कर सके और अपने खुद के 5G स्टैक को अंतरराष्ट्रीय ऑपरेटर्स को बेच सके।
इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण कॉर्पोरेट कारण यह है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज ने पिछले 6 सालों से वैश्विक निवेशकों के साथ जो कड़े शेयरहोल्डर्स एग्रीमेंट्स किए हुए थे, वे शेयर बाजार में लिस्टिंग होते ही ऑटोमैटिक रूप से पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे। वर्तमान में मेटा, गूगल और अन्य वैश्विक निवेशकों के पास जियो के बोर्ड में नॉमिनेशन करने और कई विशेष अधिकार मौजूद हैं। सार्वजनिक रूप से लिस्टेड होने के बाद ये सभी कड़े प्राइवेट पैक्ट्स और स्पेशल राइट्स डिलीट हो जाएंगे, जिससे प्रमोटर यानी रिलायंस इंडस्ट्रीज को कंपनी के ऊपर एक बिल्कुल क्लीन और स्टैंडर्ड गवर्नेंस कंट्रोल मिल सकेगा।
भले ही जियो प्लेटफॉर्म्स के पास देश का सबसे बड़ा स्पेक्ट्रम बैंक और 10 लाख किलोमीटर से ज्यादा का फाइबर नेटवर्क मौजूद है, लेकिन निवेशकों को पैसा लगाने से पहले कुछ बड़े जोखिमों के प्रति बेहद सावधान रहना चाहिए। सबसे पहला और बड़ा जोखिम स्पेक्ट्रम और लाइसेंस की भारी लायबिलिटी का है। कंपनी पर वर्तमान में लगभग 70,000 करोड़ रुपये का सीधा कर्ज दिखाई देता है, लेकिन इसमें दूरसंचार विभाग को दिए जाने वाले टाल दिए गए भुगतानों को शामिल नहीं किया गया है। वर्तमान में जियो के ऊपर दूरसंचार विभाग का लगभग 1.04 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम स्पेक्ट्रम भुगतान बकाया है, जो कंपनी के लिए एक बड़ा वित्तीय बोझ है। दूसरा बड़ा रिस्क गिरती हुई कैपिटल एफिशिएंसी का है, जहां कंपनी का रिटर्न ऑन एवरेज कैपिटल एंप्लॉयड यानी ROC वित्तीय वर्ष 2024 के 12.83% से गिरकर वित्तीय वर्ष 2026 में 10.76% पर आ गया है, जो दिखाता है कि नया कैपिटल लगाने की तुलना में मुनाफा उस रफ्तार से नहीं बढ़ रहा।
इसके अलावा अन्य तकनीकी और व्यावसायिक जोखिम भी काफी बड़े हैं। जियो वर्तमान में अपनी जियोएयरफाइबर सेवाओं के लिए अनलाइसेंस्ड बैंड रेडियो तकनीक का भारी इस्तेमाल करती है। चूंकि यह स्पेक्ट्रम अनलाइसेंस्ड है, इसलिए भविष्य में यूजर डेंसिटी बढ़ने पर इसमें भारी सिग्नल इंटरफेरेंस होने का रिस्क है, जो ग्राहकों के अनुभव को खराब कर सकता है। साथ ही, जियो के प्रीपेड रेवेन्यू का सीधा 77% हिस्सा अकेले रिलायंस रिटेल के डिस्ट्रीब्यूशन चैनल से आता है, जिससे इस वर्टिकल पर कंपनी की अत्यधिक निर्भरता साफ दिखती है। अंत में, ट्राई और दूरसंचार विभाग के बदलते कड़े नियम, जैसे कि कुल एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू का फ्लैट 8% हिस्सा लाइसेंस फीस के रूप में सरकार को देना, भविष्य में कंपनी की वित्तीय सेहत और मुनाफे पर सीधा असर डाल सकते हैं।
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