मार्केट न्यूज़
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4 min read | अपडेटेड March 16, 2026, 07:14 IST
सारांश
भारतीय शेयर बाजार के लिए यह सप्ताह काफी उतार-चढ़ाव भरा रहने वाला है। अमेरिका में होने वाली फेड मीटिंग, ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली जैसे 5 बड़े कारण मार्केट की चाल तय करेंगे। निवेशकों को इन बदलावों पर पैनी नजर रखनी होगी।

ग्लोबल मार्केट की अनिश्चितता के बीच भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों की नजरें बड़े फैसलों पर टिकी हैं।
भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने वालों के लिए आने वाला समय बड़ी चुनौतियां लेकर आ रहा है। ग्लोबल मार्केट में मची हलचल और दुनिया के अलग-अलग कोनों में चल रहे तनाव का सीधा असर हमारे घरेलू बाजार पर पड़ने वाला है। इस हफ्ते कुछ ऐसी बड़ी घटनाएं होने वाली हैं, जो तय करेंगी कि बाजार ऊपर जाएगा या नीचे। अगर आप भी स्टॉक मार्केट में एक्टिव हैं, तो आपको इन 5 बड़े ट्रिगर्स के बारे में विस्तार से जान लेना चाहिए ताकि आप अपने निवेश को सुरक्षित रख सकें।
अमेरिकी सेंट्रल बैंक यानी फेडरल रिजर्व की दो दिनों की अहम बैठक 17 मार्च से शुरू होने जा रही है। इसका फैसला 18 मार्च को आएगा, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। फिलहाल अमेरिका में ब्याज दरें 3.5 पर्सेंट से 3.75 पर्सेंट के बीच बनी हुई हैं। इससे पहले फेड ने लगातार तीन बार दरों में कटौती की थी ताकि वहां के लेबर मार्केट को मंदी से बचाया जा सके। जनवरी की मीटिंग में दरों में कोई बदलाव नहीं हुआ था, लेकिन अब इस मीटिंग से निकलने वाले संकेत भारतीय बाजार की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे।
इजरायल और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष अब और भी खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया है कि अमेरिका ईरान के खार्ग आइलैंड पर और भी हमले कर सकता है। ट्रंप का कहना है कि ईरान बातचीत तो करना चाहता है लेकिन शर्तें अभी सही नहीं हैं। ईरान की ओर से भी जवाबी हमले की धमकियां मिल रही हैं। इस युद्ध की वजह से पूरी दुनिया के बाजारों में डर का माहौल बना हुआ है, जिसका असर शेयर बाजार के सेंटीमेंट पर साफ दिख रहा है।
कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में हल्की गिरावट देखी गई है, जो भारत जैसे देश के लिए थोड़ी राहत की बात हो सकती है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने फंसे हुए रूसी तेल को खरीदने के लिए 30 दिनों की छूट दी है, जिससे सप्लाई की चिंता कम हुई है। फिलहाल ब्रेंट क्रूड 99.99 डॉलर और डब्ल्यूटीआई 95.09 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा है। हालांकि, अगर युद्ध की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रास्ता बंद होता है, तो तेल की कीमतें फिर से आसमान छू सकती हैं, जो भारतीय इकोनॉमी और कॉरपोरेट अर्निंग्स के लिए अच्छा नहीं होगा।
मिडिल ईस्ट में तनाव के बावजूद सोने की कीमतों में गिरावट देखने को मिल रही है। इंटरनेशनल मार्केट में सोना 5,000 डॉलर प्रति औंस के करीब पहुंच गया है। भारत में भी इसकी कीमत 1,60,000 रुपये के लेवल से नीचे आ गई है। इसका मुख्य कारण अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना और ट्रेजरी यील्ड का 4.27 पर्सेंट तक पहुंच जाना है। चांदी की कीमतों में भी शुक्रवार को 4.2 पर्सेंट की बड़ी गिरावट देखी गई है। कीमती धातुओं में आ रही यह गिरावट निवेशकों के पोर्टफोलियो पर असर डाल रही है।
सबसे ज्यादा चिंता की बात विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई का व्यवहार है। मार्च के पहले 15 दिनों में ही इन निवेशकों ने भारतीय बाजार से 52,704 करोड़ रुपये की भारी बिकवाली की है। सिर्फ शुक्रवार को ही 10,717 करोड़ रुपये बाहर निकाले गए, जो साल 2026 की एक दिन की सबसे बड़ी बिकवाली है। जानकारों का मानना है कि विदेशी निवेशक अब भारत के मुकाबले चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों को ज्यादा सस्ता और आकर्षक मान रहे हैं। जब तक भारत में कंपनियों के नेट प्रॉफिट में सुधार के साफ संकेत नहीं मिलते, तब तक यह बिकवाली जारी रह सकती है।
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