मार्केट न्यूज़
.png)
4 min read | अपडेटेड October 04, 2026, 17:08 IST
सारांश
भारतीय शेयर बाजार में पिछले 25 सालों में पहली बार लगातार आठ हफ्तों तक गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट कोविड और 2008 के संकट से भी बड़ी है। कच्चे तेल के दाम, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी, FII की भारी बिकवाली, टीसीएस के नतीजे और रुपए की कमजोरी की वजह से अगले हफ्ते भी बाजार में हलचल बनी रह सकती है।

दलाल स्ट्रीट में बीते आठ हफ्तों से बिकवाली का माहौल बना हुआ है।
भारतीय शेयर बाजार ने एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया है जिसकी उम्मीद किसी भी निवेशक को नहीं थी। दलाल स्ट्रीट में लगातार आठ हफ्तों तक गिरावट दर्ज की गई है, जो पिछले 25 सालों में पहली बार देखने को मिला है। यह मंदी साल 2020 के कोविड-19 क्रैश और साल 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के समय आई गिरावट से भी ज्यादा गंभीर है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, बॉन्ड यील्ड में तेजी और महंगाई की चिंताओं ने बाजार का मूड पूरी तरह बिगाड़ दिया है। आइए जानते हैं कि वे कौन से 5 मुख्य कारण हैं, जो अगले हफ्ते शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव पैदा कर सकते हैं।
यूरोपीय देशों के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस अपील पर सहमत होने के बाद इस हफ्ते तेल की कीमतों में थोड़ी कमी आई है, जिसमें डीजल रिजर्व जारी करने और अमेरिका से फ्यूल का आयात घटाने को कहा गया था। हालांकि एनालिस्ट्स अभी भी इसे लेकर चिंतित हैं। जेपी मॉर्गन के एनालिस्ट्स का कहना है कि युद्ध के छह महीने बाद भी कोई स्पष्ट एग्जिट स्ट्रैटेजी नहीं दिख रही है। वहीं गोल्डमैन सैक्स के एक्सपर्ट्स के अनुसार, अगर मिडिल ईस्ट में जहाजों पर हमले तेज होते हैं तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। हालांकि एक्सपोर्ट सामान्य होने पर इसके वापस 80 डॉलर प्रति बैरल पर आने की उम्मीद है।
दुनिया भर में उधारी की कॉस्ट और एसेट की कीमतों को तय करने वाली 10-साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 5.34% हो गई है। यह साल 2002 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। अमेरिकी यील्ड में इस तेज बढ़त से भारतीय इक्विटी पर सीधा दबाव पड़ रहा है, क्योंकि विदेशी निवेशकों के लिए सुरक्षित अमेरिकी सरकारी बॉन्ड ज्यादा आकर्षक बन गए हैं। इससे भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा बाहर निकल रहा है, जिससे रुपए और शेयर बाजार दोनों पर असर पड़ रहा है। रुपए कमजोर होने से आयात की लागत और बढ़ सकती है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FII ने महज छह ट्रेडिंग सेशन के भीतर 43,687 करोड़ रुपये के शेयर बेच डाले हैं। पिछले तीन सेशन में यह बिकवाली और तेज हुई है। FII का इंडेक्स फ्यूचर्स लॉन्ग-शॉर्ट रेशियो गिरकर 8.01% पर आ गया है, जो उनके ऐतिहासिक दायरे के निचले स्तर के करीब है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 5.2% के पास होने से FII की यह बिकवाली स्वाभाविक मानी जा रही है। बर्नस्टीन की रिपोर्ट के मुताबिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ट्रेड के बाद विदेशी निवेशकों की वापसी इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत सेमीकंडक्टर, बैटरी और एनर्जी स्टोरेज जैसे सेक्टर्स में कितना प्रतिस्पर्धी बनता है।
अगले हफ्ते से कॉर्पोरेट अर्निंग्स सीजन की आधिकारिक शुरुआत हो रही है, जिसमें टीसीएस और डीमार्ट समेत 21 कंपनियां अपने दूसरी तिमाही के नतीजे घोषित करेंगी। इससे बाजार के मूड का अहम अंदाजा मिलेगा। टीसीएस के नतीजों में रेवेन्यू ग्रोथ, नई डील, मार्जिन और आईटी खर्च पर मैनेजमेंट की टिप्पणी अहम होगी। वहीं डीमार्ट के आंकड़ों से कंज्यूमर डिमांड, सेल्स ग्रोथ और ऑपरेटिंग मार्जिन का पता चलेगा। इन नतीजों में किसी भी बड़े अंतर का असर पूरे आईटी और कंजम्पशन सेक्टर के सेंटिमेंट पर पड़ेगा।
ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और तेल की ऊंची दरों के कारण भारतीय रुपया दो महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है। विदेशी पोर्टफोलियो से पैसे निकलने के कारण रुपए पर पहले से ही दबाव बना हुआ है। इस स्थिति में एक्सपोर्टर्स अपनी मिलने वाली रकम की हेजिंग को लेकर सतर्क हैं, जबकि इम्पोर्टर्स की हेजिंग काफी मजबूत बनी हुई है। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डिमांड और सप्लाई का अंतर बढ़ गया है।
संबंधित समाचार
लेखकों के बारे में
.png)
अगला लेख