return to news
  1. युद्ध, व्यापार पर तनाव... वैश्विक जोखिम स्टॉक मार्केट को यूं देते हैं झटका, IMF ने बताया किसको-कितना खतरा

मार्केट न्यूज़

युद्ध, व्यापार पर तनाव... वैश्विक जोखिम स्टॉक मार्केट को यूं देते हैं झटका, IMF ने बताया किसको-कितना खतरा

Upstox

3 min read | अपडेटेड April 15, 2025, 14:00 IST

सारांश

Geopolitical Risks: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने बताया है कि कैसे जियोपॉलिटिकल रिस्क के चलते स्टॉक प्राइसेज पर असर पड़ता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि युद्ध से लेकर कूटनीतिक तनाव तक के चलते आर्थिकि व्यवस्था धीमी पड़ती है और वित्तीय संकट पैदा होने का खतरा रहता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कैसे इन खतरों से निपटा जा सकता है।

IMF की रिपोर्ट के मुताबिक सैन्य टकराव जैसे कारणों से ऐसेट प्राइस पर नकारात्मक असर पड़ता है।

IMF की रिपोर्ट के मुताबिक सैन्य टकराव जैसे कारणों से ऐसेट प्राइस पर नकारात्मक असर पड़ता है।

युद्ध और आतंकवाद से लेकर कूटनीतिक तनाव जैसे कारणों से ग्लोबल ट्रेड और निवेश को भारी घाटा हो सकता है। ऐसा होने से आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ती हैं और वित्तीय स्थिरता पर खतरा पैदा होता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund, IMF) की रिपोर्ट में इस बारे में बताया गया है।

Open FREE Demat Account within minutes!
Join now

रिपोर्ट में बताया गया है कि अलग-अलग तरह के जियोपॉलिटिकल खतरों में से सबसे ज्यादा नुकसान अंतरराष्ट्रीय सैन्य टकरावों के कारण होता है। इससे उभरते हुए बाजारों को भारी झटका लगता है।

IMF की ग्लोबल फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट के मुताबिक तनावपूर्ण जियोपॉलिटिकल घटनाओं और उनसे जुड़े खतरों के कारण स्टॉक प्राइस में गिरावट देखी जाती है।

रिपोर्ट के मुताबिक इससे औसतन 1 पर्सेंट पॉइंट की मासिक गिरावट होती है जबकि उभरते हुए बाजारों में ये गिरावट 2.5 पर्सेंट पॉइंट पर पहुंच जाती है। वहीं, सैन्य टकराव के कारण ये गिरावट 5 पर्सेंट पॉइंट्स तक पहुंच जाती है।

किससे, कितना खतरा?

IMF की रिपोर्ट में बताया गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोखिम पैदा होने से संपत्ति की कीमतों, वित्तीय संस्थानों और निजी क्षेत्र को क्रेडिट मिलना कम हो सकता है जिससे आर्थिक गतिविधियां सुस्त पड़ती हैं। यह ज्यादा बड़ा खतरा इसलिए है क्योंकि ये अचानक से पैदा हो सकते हैं।

इसके अलावा जियोपॉलिटिकल जोखिम होने से पब्लिक सेक्टर पर भी असर होता है जिससे आर्थिक वृद्धि की रफ्तार कम होती है और सरकार खर्च बढ़ाती है। इससे सॉवरेन रिस्क प्रीमियम बढ़ने लगते हैं। ऐसे में सरकार के ऊपर वित्तीय बोझ बढ़ने लगता है।

रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी घटनाओं की अनिश्चितता के चलते ऐसेट प्राइस पर असर होता है। जियोपॉलिटिकल घटनाओं के चलते मैक्रोइकॉनमिक अनिश्चतता कई महीनों तक रहती है। निवेशक इन जोखिम को पहचानते हैं।

अचानक ऐसेट प्राइस गिरने से बैंक और गैर-वित्तीय संस्थानों पर असर पड़ सकता है जिससे वित्तीय व्यवस्था और रियल इकॉनमी पर असर पड़ सकता है।

इन खतरों से कैसे निपटें?

IMF की इस रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय संस्थानों और उसके रेग्युलेटर्स को ऐसे रिस्क पहचानने, उनकी तीव्रता नापने और मैनेज करने के लिए कोशिशें करनी चाहिए और स्ट्रेस टेस्ट जैसे पर्याप्त संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहिए।

इसके साथ ही वित्तीय संस्थानों के पास पर्याप्त कैपिटल और लिक्विडिटी होनी चाहिए जिससे इन खतरों से होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके।

उभरते हुए बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को और भी ज्यादा कोशिशें की जानी चाहिए जिससे निवेशों को जोखिम से निपटने में मदद की जा सके। इसके अलावा वित्तीय नीति और अंतरराष्ट्रीय रिजर्व होने से भी इनसे बचाव हो सकता है।

लेखकों के बारे में

Upstox
Upstox Hindi News Desk पत्रकारों की एक टीम है जो शेयर बाजारों, अर्थव्यवस्था, वस्तुओं, नवीनतम व्यावसायिक रुझानों और व्यक्तिगत वित्त को उत्साहपूर्वक कवर करती है।

अगला लेख