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5 min read | अपडेटेड July 08, 2026, 12:03 IST
सारांश
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक शिपिंग कारोबार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इस बड़ी हलचल के बीच भारत सरकार कोचीन शिपयार्ड में अपनी हिस्सेदारी बेचने जा रही है। नॉन-रिटेल निवेशकों से मिले शानदार रिस्पॉन्स के बाद अब आज से रिटेल निवेशक भी इसमें पैसा लगा सकते हैं।
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कोचीन शिपयार्ड के ऑफर फॉर सेल यानी OFS को पहले दिन निवेशकों का जबर्दस्त समर्थन मिला है। | Image: Shutterstock
दुनिया भर में इस समय भू-राजनीतिक तनाव काफी बढ़ा हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर कमर्शियल जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक शिपिंग कारोबार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इस भारी उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता के माहौल के बीच भारतीय शेयर बाजार में डिफेंस और शिपबिल्डिंग सेक्टर की दिग्गज सरकारी कंपनी कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड सुर्खियों में बनी हुई है। केंद्र सरकार इस संकट के समय में कंपनी के भीतर अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए ऑफर फॉर सेल यानी OFS लेकर आई है। गैर-रिटेल निवेशकों से मिले जबर्दस्त रिस्पॉन्स के बाद 8 जुलाई को यह OFS आम यानी रिटेल निवेशकों के लिए खोल दिया गया है।
सबसे पहले OFS की बात करते हैं। कोचीन शिपयार्ड के OFS के पहले दिन बाजार के बड़े और गैर-रिटेल निवेशकों ने कंपनी के बिजनेस पर भारी भरोसा जताया। निवेश और लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग के सचिव के मुताबिक, पहले दिन इस इश्यू को 3.52 गुना से भी ज्यादा सब्सक्राइब किया गया। निवेशकों की इस भारी डिमांड और जबर्दस्त उत्साह को देखते हुए सरकार ने तुरंत बड़ा फैसला लिया। सरकार ने अपने OFS के तहत ग्रीनशू ऑप्शन को पूरी तरह से इस्तेमाल करने का मन बना लिया है। इसके तहत अब सरकार कंपनी में अतिरिक्त 2.52 पर्सेंट हिस्सेदारी और बेचेगी। इस फैसले के बाद अब बाजार में बेची जाने वाली कुल हिस्सेदारी का साइज बढ़कर 5.04 पर्सेंट हो गया है, जो पहले की तुलना में दोगुना है।
सरकार ने कोचीन शिपयार्ड के शेयरों को बेचने के लिए न्यूनतम कीमत यानी फ्लोर प्राइस 1,400 रुपये प्रति शेयर तय की है। इसका मतलब है कि कोई भी निवेशक इस तय कीमत से कम पर बोली नहीं लगा सकता है। अंतिम अलॉटमेंट प्राइस का फैसला निवेशकों की मांग और OFS के दौरान मिलने वाली बोलियों के आधार पर किया जाएगा। सरकार शुरुआत में केवल 2.52 पर्सेंट हिस्सेदारी बेचने की तैयारी के साथ आई थी, लेकिन ग्रीनशू ऑप्शन की सुविधा होने के कारण इसे बढ़ाकर 5.04 पर्सेंट कर दिया गया है। यह पूरा सौदा सरकार के चालू वित्त वर्ष 2026-27 के विनिवेश प्लान का एक अहम हिस्सा है। चूंकि इसमें नए शेयर जारी नहीं किए जा रहे हैं बल्कि मौजूदा शेयरों को ही ट्रांसफर किया जा रहा है, इसलिए इस बिक्री से मिलने वाला पूरा फंड सरकार के पास जाएगा और कोचीन शिपयार्ड को इससे कोई सीधी रकम नहीं मिलेगी। हालांकि, इससे बाजार में कंपनी के पब्लिक शेयरहोल्डिंग का दायरा काफी बढ़ जाएगा।
अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हवाई हमलों और समुद्री रास्तों में बढ़ते खतरों की वजह से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग इंडस्ट्री भारी दबाव में है। लेकिन इसके बावजूद भारतीय डिफेंस और शिपबिल्डिंग कंपनियों का आउटलुक बेहद मजबूत दिखाई दे रहा है। कोचीन शिपयार्ड देश की एक प्रमुख पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज है जो जहाज निर्माण और उनकी मरम्मत के काम में अग्रणी भूमिका निभाती है। कंपनी के पास दमदार ऑर्डर बुक है। लेकिन पिछले एक साल के दौरान इस कंपनी के शेयरों ने निवेशकों को 29 फीसदी का निगेटिव रिटर्न दिया है। इसके पीछे एक सबसे बड़ा वजह विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी है और यह बिकवाली ग्लोबल टेंशन की वजह से हो रही है। हालांकि इस कंपनी के संदर्भ में देखें तो पिछले कुछ सालों में सरकार द्वारा डिफेंस प्रोडक्शन पर भारी खर्च किया जा रहा है। सरकार मेक इन इंडिया मुहिम के तहत नौसेना के आधुनिकीकरण पर लगातार बड़ा फोकस कर रही है। घरेलू स्तर पर मिलने वाले बड़े ऑर्डर्स की वजह से कंपनी का फ्यूचर काफी सुरक्षित नजर आ रहा है।
रही बात कि इस ग्लोबल संकट के बीच सरकार इस मजबूत कंपनी में अपनी हिस्सेदारी क्यों बेच रही है। तो दरअसल इसके पीछे सरकार की एक सोची-समझी वित्तीय रणनीति काम कर रही है। दरअसल, सरकार कोचीन शिपयार्ड में अपनी हिस्सेदारी बेचकर नॉन-टैक्स कैपिटल रिसीट्स को मजबूत करना चाहती है। इस हिस्सेदारी बिक्री से मिलने वाला फंड सरकार को वित्त वर्ष 2027 के लिए तय किए गए फिस्कल डेफिसिट टारगेट यानी राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी मदद देगा। इसके अलावा, आने वाले समय में फर्टिलाइजर और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर दी जाने वाली सब्सिडी की जरूरतें काफी बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे में हिस्सेदारी बेचने और एसेट मोनेटाइजेशन से मिलने वाली यह बड़ी रकम सरकार को अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान करेगी, जिससे वह सब्सिडी के बढ़ते बोझ को आसानी से संभाल सकेगी।
सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए सरकारी कंपनियों के विनिवेश और एसेट मोनेटाइजेशन के जरिए कुल 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का एक बड़ा बजट लक्ष्य रखा है। कोचीन शिपयार्ड से पहले सरकार चालू वित्त वर्ष में 6 अन्य सरकारी कंपनियों में ऑफर फॉर सेल के जरिए अपनी हिस्सेदारी बेच चुकी है। इन कंपनियों में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, कोल इंडिया, NHPC, NLC इंडिया, GIC और IRFC शामिल हैं। इन छह कंपनियों के जरिए सरकार अब तक कुल मिलाकर 18,561 करोड़ रुपये जुटाने में कामयाब रही है। जैसे ही पेंडिंग प्रोसीड्स को खातों में शामिल किया जाएगा, सरकार की विनिवेश से होने वाली कुल कमाई 15,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार करने की उम्मीद है, जिससे देश के आर्थिक ढांचे को और मजबूती मिलेगी।
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