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3 min read | अपडेटेड October 26, 2024, 13:30 IST
सारांश
भारत का कपड़ा उद्योग दुनिया की सबसे बड़ी इंडस्ट्रीज में से एक है। हालांकि, इसके साथ ही इंडस्टी प्रदूषण के मामले में भी काफी आगे है। पानी की बर्बादी और प्रदूषण से लेकर माइक्रोफाइबर तक, इसके हर चरण में एक खतरा बना रहता है। ऐसे में Sustainable फैशन ट्रेंड्स को फॉलो करना बेहद जरूरी हो जाता है।

टेक्सटाइल इंडस्ट्री को ग्रीन करना जरूरी
भारत की बड़ी आबादी, तेजी से बदलते ट्रेंड्स और आम आदमी की बेहद बेसिक जरूरत को पूरा करने की बदौलत टेक्सटाइल इंडस्ट्री दुनिया में सबसे बड़ी इंडस्ट्रीज में से एक है। हालांकि, इस मुकाम पर पहुंचने के लिए इंडस्ट्री को पर्यावरण के साथ समझौता भी करना पड़ता है। पानी की बर्बादी से लेकर रेशों के कारण होने वाले प्रदूषण तक में यह बढ़ोतरी करती है। ऐसे में सतत विकास का आयाम यहां भी जरूरी हो जाता है। क्यों जरूरी है सस्टेनबल फैशन? वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट की एक 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत पानी का गंभीर संकट झेल रहे देशों की फेहरिस्त में 13वें नंबर पर है। टेक्सटाइल इंडस्ट्री अकेले हर रोज 42,50,00,000 गैलन पानी इस्तेमाल करती है। इस बर्बादी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक जींस तैयार करने में ही 500 गैलन पानी लग जाता है। एक एस्टिमेट के मुताबिक साल 2050 तक टेक्सटाइल इंडस्ट्री से पानी में प्रदूषण दोगुना हो जाएगा। क्यों होता है इतना प्रदूषण? कपड़े बनानी की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा होता है उन्हें रंगना। इसके लिए इस्तेमाल होने वाली डाई पानी में मिलकर उसे मैला करती हैं। प्रोसेसिंग के दौरान बार- बार धुलने के लिए भी बड़ी मात्रा में पानी का इस्तेमाल होता है। आमतौर पर इकाइयां बिना प्रोसेस किए इस गंदे पानी का डिस्चार्ज कर देती हैं जिससे नदियां, तालाब गंदे होते हैं। इन केमिकल्स के कारण पानी में घुली हुई ऑक्सिजन, बायलॉजिकल ऑक्सिजन डिमांड और केमिकल ऑक्सिजन डिमांड पर बुरा असर पड़ता है। ऐसा पानी जल-जीवन और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के जीवन पर भी खतरा बन जाता है। यही नहीं, हवा में उड़ने वाले कपड़ों के रेशे या माइक्रोफाइबर वायु प्रदूषण को भी बढ़ाते हैं। यहां तक कि इनके कारण एसिड रेन और ग्लोबल वॉर्मिंग में भी इजाफा हो सकता है। क्या है सस्टेनबल फैशन? टेक्सटाइल इंडस्ट्री के कामकाज में कई चरणों के दौरान पर्यावरण पर होने वाले बुरे असर को कम किया जा सकता है। जैसे रीसाइकल किए हुए कच्चे माल, नैचरल फाइबर्स और डाई का इस्तेमाल करना। ऐसे ट्रेंड्स को प्रमोट करना जिनमें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कपड़ों की जगह दूसरे स्टाइल्स को तरजीह दी जाए ताकि जीरो वेस्ट फैशन मेनस्ट्रीम किया जा सके। फास्ट फैशन से होने वाले नुकसान के बारे में लोगों को जागरूक करना। मार्केट में क्या है ट्रेंड? ऐसे कई ब्रांड्स हैं जो सस्टेनबल फैशन को आगे लेकर जा रहे हैं। जैसे No Nasties ऑर्गैनिक और वीगन कपड़ों का इस्तेमाल करता है जिससे पशुओं पर होने वाली अमानवीयता को रोका जा सके। Doodlage कपड़े की कतरनें जोड़कर रोचक और फंकी डिजाइन्स तैयार करता है। The Terra Tribe और 11.11 नैचरल डाई का इस्तेमाल करते हैं। कैसे हो समाधान? ग्लोबल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ इंटरनैशनल ट्रेड के मुताबिक केले के फाइबर, रीसाइकल्ड प्लास्टिक जैसे कच्चे माल की मदद से डिजाइनर्स ग्रीन टेक्सटाइल बना सकते हैं। सर्कुलर फैशन पर आधारित बिजनेस मॉडल्स को भी बढ़ावा देना चाहिए। प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण को देखते हुए ग्रीन पैकेजिंग पर भी फोकस करना चाहिए। सरकार ने उठाए हैं क्या कदम? भारत सरकार ने टेक्सटाइल इंडस्ट्री को सस्टेनबल बनाने के लिए प्रॉजेक्ट SU.RE 2019 में शुरू किया गया था। इसके अलावा सस्टेनबल फैशन ऐंड इंडियन टेक्सटाइल (SUIT) पहल और हथकरघा विकास प्रोग्राम के जरिए इनोवेटर्स को सपॉर्ट दिया जाता है। पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक पर भी सिंगल यूज प्लास्टिक बैन के साथ नकेल कसी जा सकी है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में टेक्सटाइल इंडस्ट्री को ग्रीन बनाया जा सकेगा।
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