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Abraham Accords क्या है? ट्रंप मुस्लिम देशों को इस समझौते में क्यों करना चाहते हैं शामिल? समझिए सबकुछ

Shubham Singh Thakur

4 min read | अपडेटेड May 26, 2026, 13:04 IST

सारांश

अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) एक ऐसा समझौता है जिसे अमेरिका ने 2020 में शुरू कराया था। इसका मकसद था कि इजराइल और अरब/मुस्लिम देशों के बीच जो लंबे समय से दुश्मनी थी, उसे खत्म किया जाए और उनके बीच सामान्य रिश्ते बनाए जाएं।

Donald Trump

अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump फिर से Abraham Accords को बढ़ाना चाहते हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता चल रही है लेकिन इस बीच अचानक Abraham Accords की चर्चा तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील के हिस्से के रूप में मुस्लिम देशों के सामने शर्त रख दी है कि उन्हें इजराइल के साथ रिश्ते बेहतर करने होंगे और इसके लिए Abraham Accords पर साइन करना होगा। यहां हम समझेंगे कि Abraham Accords क्या है और अभी यह इतना अहम क्यों हो गया है।

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क्या है Abraham Accords?

अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) एक ऐसा समझौता है जिसे अमेरिका ने 2020 में शुरू कराया था। इसका मकसद था कि इजराइल और अरब/मुस्लिम देशों के बीच जो लंबे समय से दुश्मनी थी, उसे खत्म किया जाए और उनके बीच सामान्य रिश्ते बनाए जाएं। सामान्य रिश्ते का मतलब है कि देश एक-दूसरे के साथ दूतावास खोलें, व्यापार करें, निवेश करें, सुरक्षा और टेक्नोलॉजी में साथ काम करें।

पहला समझौता 15 सितंबर 2020 को हुआ था, जब इजराइल ने यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) और बहरीन के साथ रिश्ते सामान्य किए। इसके बाद मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए। 2025 में कजाखस्तान भी इस समूह में जुड़ा, हालांकि उसके पहले से इजराइल के साथ संबंध थे।

समझौते का नाम Abraham क्यों है?

इस समझौते का नाम “Abraham” इसलिए रखा गया क्योंकि यहूदी, मुस्लिम और ईसाई तीनों धर्मों में पैगंबर अब्राहम को अहम माना जाता है। इसलिए इसे एक तरह से धार्मिक और सांस्कृतिक साझा पहचान का प्रतीक भी बताया गया।

यह समझौता इसलिए खास माना गया क्योंकि पहले अरब देशों का कहना था कि जब तक फिलिस्तीन को अलग देश नहीं मिल जाता और उसका मुद्दा हल नहीं होता, तब तक वे इजराइल को मान्यता नहीं देंगे। लेकिन Abraham Accords ने इस पुराने रुख को बदल दिया। इसमें फिलिस्तीन मुद्दे को अलग रखकर सीधे इजराइल से रिश्ते बनाने पर जोर दिया गया।

इस समझौते के पीछे एक बड़ा कारण ईरान भी है। कई अरब देश और इजराइल नों ईरान को क्षेत्र में बढ़ते खतरे के रूप में देखते हैं। इसलिए उनके लिए साथ आना रणनीतिक रूप से फायदेमंद माना गया।

Donald Trump इस समझौते पर क्यों दे रहे हैं जोर?

अब अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump फिर से इस समझौते को बढ़ाना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि Saudi Arabia, Qatar, Pakistan, Turkiye, Egypt और Jordan जैसे देशों को भी इसमें शामिल होना चाहिए। उनका दावा है कि इससे मध्य पूर्व में शांति आएगी और सभी देशों को आर्थिक फायदा होगा।

डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा कि यह कोशिश ईरान के साथ चल रही बातचीत से जुड़ी है। अमेरिका और Iran के बीच बातचीत चल रही है ताकि क्षेत्र में तनाव कम हो। ट्रंप का कहना है कि अगर ईरान के साथ समझौता हो जाता है, तो उसके बाद कई देश Abraham Accords में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि भविष्य में ईरान भी इसका हिस्सा बन सकता है।

पाकिस्तान ने किया विरोध

डोनाल्ट ट्रंप के इस प्रस्ताव का सबसे पहले पाकिस्तान ने विरोध किया। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री Khawaja Muhammad Asif ने साफ कहा कि पाकिस्तान ऐसा कोई समझौता नहीं करेगा जो उसकी विचारधारा के खिलाफ हो। पाकिस्तान का कहना है कि वह इजराइल को तब तक नहीं मानेगा, जब तक एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश नहीं बनता, जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम हो।

अन्य देशों का क्या कहना है?

मध्य पूर्व के अन्य देशों ने भी ट्रंप की बात पर तुरंत हां नहीं कहा। रिपोर्ट्स के मुताबिक जब ट्रंप ने नेताओं के साथ फोन कॉल पर यह मुद्दा उठाया, तो कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। खासकर Saudi Arabia, Qatar और Pakistan की तरफ से तुरंत कोई उत्साह नहीं दिखा।

सबसे ज्यादा विरोध सऊदी अरब की तरफ से माना जा रहा है। सऊदी का कहना है कि वह तभी इजरायल को मान्यता देगा, जब फिलिस्तीन के लिए एक स्पष्ट और स्थायी समाधान होगा। ईरान ने भी इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि ईरान कभी इजराइल को मान्यता नहीं देगा।

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