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5 min read | अपडेटेड June 02, 2026, 11:12 IST
सारांश
रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की तीन दिवसीय बैठक बुधवार 3 जून से शुरू होने जा रही है। गवर्नर संजय मल्होत्रा 5 जून को नीतिगत फैसलों का एलान करेंगे। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, वैश्विक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल के बढ़ते दामों के बीच इस बार भी रेपो रेट को 5.25 पर्सेंट पर बरकरार रखा जा सकता है।

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अगुवाई में कल से शुरू होगी एमपीसी की समीक्षा बैठक।
भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी यानी एमपीसी की तीन दिनों तक चलने वाली अहम बैठक बुधवार 3 जून से शुरू होने जा रही है। रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा 5 जून को इस बैठक में लिए गए फैसलों का एलान करेंगे। शेयर बाजार के निवेशकों और अर्थशास्त्रियों की नजरें इस बैठक पर पूरी तरह टिकी हुई हैं। बाजार को बड़े पैमाने पर यह उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक इस बार भी बेंचमार्क रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा और इसे 5.25 पर्सेंट पर ही बरकरार रखेगा। हालांकि, ब्याज दरों से ज्यादा इस बार लोगों की नजर महंगाई, आर्थिक विकास और वेस्ट एशिया में बने तनावपूर्ण हालातों पर रिजर्व बैंक की कमेंट्री पर रहने वाली है।
यह आगामी पॉलिसी समीक्षा ऐसे समय में हो रही है जब ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। इसके साथ ही ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे विवाद के कारण सप्लाई चेन की चिंताएं फिर से सामने आ गई हैं और भारतीय रुपया भी दबाव में देखा जा रहा है। इन सभी वजहों से भारत में महंगाई और ग्रोथ के आउटलुक को लेकर अनिश्चितता काफी बढ़ गई है, जिससे यह संभावना जताई जा रही है कि केंद्रीय बैंक इस बार थोड़ा सतर्क रुख अपना सकता है।
भले ही अप्रैल के महीने में रिटेल महंगाई दर घटकर 3.48 पर्सेंट पर आ गई थी, लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हाल ही में कच्चे तेल के दामों में जो उछाल आया है, वह आने वाली तिमाहियों में महंगाई का पूरा गणित बिगाड़ सकता है। एसबीआई के इकोनॉमिक रिसर्च डिपार्टमेंट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा तिमाही में महंगाई 4 से 4.1 पर्सेंट के आसपास रह सकती है, लेकिन अगली तीन तिमाहियों के दौरान कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी सीपीआई 5 पर्सेंट के पार जा सकता है।
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस को भी उम्मीद है कि रिजर्व बैंक दरों को तो स्थिर रखेगा लेकिन उसका लहजा काफी सख्त हो सकता है। उनके मुताबिक, रिजर्व बैंक अपने महंगाई के अनुमान को बढ़ाकर 5 पर्सेंट के करीब कर सकता है, जबकि जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 6.9 पर्सेंट से घटाकर 6.5 पर्सेंट के आसपास ला सकता है। बता दें कि रिजर्व बैंक का महंगाई का लक्ष्य 4 पर्सेंट है, जिसमें 2 से 6 पर्सेंट का टॉलरेंस बैंड तय किया गया है।
महंगाई के अलावा कमोडिटी की बढ़ती कीमतों और ग्लोबल ट्रेड में चल रही रुकावटों की वजह से देश की आर्थिक विकास दर यानी ग्रोथ को लेकर भी चिंताएं बढ़ गई हैं। रिजर्व बैंक ने अपनी पिछली बैठक में वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 6.9 पर्सेंट लगाया था। हालांकि, बाहरी मोर्चे पर बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए अर्थशास्त्री अब मान रहे हैं कि केंद्रीय बैंक इस अनुमान में थोड़ी कटौती कर सकता है। एसबीआई की रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2027 के लिए जीडीपी ग्रोथ 6.6 पर्सेंट रहने का अनुमान लगाया गया है, जबकि वित्त वर्ष 2026 के लिए इसे 7.5 पर्सेंट आंका गया है। रिजर्व बैंक ने अपनी ताजा सालाना रिपोर्ट में भी कहा है कि मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स की वजह से भारतीय इकोनॉमी का फ्यूचर पॉजिटिव है, लेकिन वेस्ट एशिया में लंबा खिंचता विवाद ग्रोथ के लिए एक बड़ा रिस्क साबित हो सकता है।
बाजार के एक्सपर्ट्स का मानना है कि जून की इस नीतिगत समीक्षा में केवल ब्याज दरों के फैसले पर ही ध्यान नहीं होगा, बल्कि फ्यूचर के कदमों को लेकर रिजर्व बैंक क्या गाइडेंस देता है, वह देखना सबसे ज्यादा अहम होगा। क्रिसिल की प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट दीप्ति देशपांडे को उम्मीद है कि एमपीसी रेपो रेट को स्थिर रखते हुए अपना न्यूट्रल रुख बरकरार रखेगी क्योंकि मौजूदा समय में महंगाई का दबाव मुख्य रूप से कमजोर रुपये और ईंधन की ऊंची लागत जैसी सप्लाई से जुड़ी वजहों से है। जियोपॉलिटिकल हालातों के अलावा मानसून का आउटलुक भी इस बैठक की चर्चाओं में सबसे ऊपर रहने वाला है। भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी आईएमडी ने जून से सितंबर के मानसून सीजन के दौरान सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान लगाया है, जो लॉन्ग पीरियड एवरेज का 90 पर्सेंट हो सकती है।
इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने भी कहा है कि मानसून की अनिश्चितता और वेस्ट एशिया के तनाव को देखते हुए रिजर्व बैंक को काफी सावधानी बरतनी होगी। दूसरी तरफ इक्विरस कैपिटल के एमडी विनय पाई का कहना है कि बाजार अभी आने वाले महीनों में 25 से 50 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की संभावना को मानकर चल रहा है। अगर कच्चे तेल के दाम लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बने रहते हैं, तो महंगाई के दबाव के कारण अगस्त तक ब्याज दरों में 50 बेसिस पॉइंट तक की बढ़ोतरी की जा सकती है।
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