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18 min read | अपडेटेड January 29, 2026, 16:03 IST
सारांश
Economic Survey 2025-26 LIVE: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश कर दिया है। इस रिपोर्ट में 1 फरवरी को आने वाले बजट से पहले देश की आर्थिक स्थिति का पूरा ब्यौरा है।

संसद में आज वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण देश की अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा यानी आर्थिक सर्वेक्षण पेश कर दिया है।
Economic Survey 2025-26 LIVE: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आज का दिन बेहद खास है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज यानी 29 जनवरी को संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश कर दिया है। यह सर्वेक्षण एक तरह से सरकार की ओर से देश की आर्थिक स्थिति का आकलन होता है, जिसे हर साल 1 फरवरी को आने वाले आम बजट से ठीक पहले पेश किया जाता है। इस रिपोर्ट के जरिए देश को यह पता चलता है कि पिछले एक साल के दौरान सरकारी नीतियों का अर्थव्यवस्था पर कैसा असर रहा है और वर्तमान में भारत की आर्थिक स्थिति कितनी मजबूत है।
आर्थिक सर्वेक्षण को वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले आर्थिक मामलों के विभाग द्वारा तैयार किया जाता है। यह दस्तावेज इस बात की समीक्षा करता है कि पिछले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था ने कैसा प्रदर्शन किया है। इसमें खेती, उद्योग और सेवा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में हुई प्रगति का डेटा शामिल होता है। यह सर्वे केवल बीते हुए कल की बात नहीं करता, बल्कि आने वाले साल के लिए आर्थिक नजरिया और रोडमैप भी तैयार करता है। हालांकि यह सर्वेक्षण सरकार के लिए नीतिगत रूप से बाध्यकारी नहीं होता, लेकिन यह आने वाले बजट के लिए एक मजबूत आधार और रूपरेखा प्रदान करता है।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार 31 दिसंबर 2025 तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के पास कस्टडी में मौजूद कुल एसेट बेस ₹81.4 लाख करोड़ रहा है। यह आंकड़ा 31 मार्च 2025 के मुकाबले 10.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी को दर्शाता है, जिसका बड़ा कारण शेयरों की वैल्यू में हुआ इजाफा और डेट मार्केट (कर्ज बाजार) में लगातार की गई खरीदारी है। हालांकि, एनएससी (NSE) में लिस्टेड कंपनियों में इनकी हिस्सेदारी में कमी देखी गई है। वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही तक यह गिरकर 16.9 प्रतिशत रह गई है। सर्वे के मुताबिक इस गिरावट की मुख्य वजह ग्लोबल मार्केट में बढ़ती अनिश्चितता और निवेशकों द्वारा अलग-अलग सेक्टरों में किए जा रहे बदलाव को माना जा रहा है।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार भारतीय शेयर बाजार में घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने लगातार अपनी पकड़ मजबूत की है और वे नेट खरीदार बने रहे हैं। इन निवेशकों ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली का डटकर मुकाबला किया है और घरेलू बाजार को मजबूती प्रदान की है। यह पहली बार वित्त वर्ष 2025 की चौथी तिमाही में हुआ था जब होल्डिंग वैल्यू के मामले में DIIs ने विदेशी निवेशकों (FII) को पीछे छोड़ दिया था।
वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में घरेलू संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़कर 18.3 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इसके उलट विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की हिस्सेदारी गिरकर 16.7 प्रतिशत रह गई है, जो पिछले 13 सालों का सबसे निचला स्तर है। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि अब हमारा शेयर बाजार बाहरी निवेशकों के बजाय देश के भीतर के बड़े फंड्स और निवेशकों के भरोसे ज्यादा सुरक्षित और स्थिर है।
आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में दिसंबर 2025 तक देश में 2.35 करोड़ (235 लाख) नए डीमैट खाते खोले गए हैं। इसके साथ ही देश में डीमैट खातों की कुल संख्या 21.6 करोड़ के पार निकल गई है। सर्वे में एक और बड़ी उपलब्धि का जिक्र किया गया है कि सितंबर 2025 में देश के यूनिक निवेशकों (unique investors) की संख्या 12 करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है।
आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में दिसंबर 2025 तक आईपीओ की संख्या में पिछले साल के मुकाबले 20 प्रतिशत की शानदार बढ़ोतरी देखी गई है। इसके जरिए जुटाई गई कुल रकम में भी 10 प्रतिशत का इजाफा हुआ है, जो दिखाता है कि प्राइमरी मार्केट में निवेशकों का भरोसा काफी मजबूत है। अगर हम मेन बोर्ड पर लिस्टिंग की बात करें, तो यह संख्या 69 से बढ़कर 94 तक पहुंच गई है। इस दौरान कंपनियों द्वारा जुटाई गई रकम ₹1,46,534 करोड़ से बढ़कर ₹1,60,273 करोड़ के पार निकल गई है। इस साल के आईपीओ बाजार की एक सबसे खास बात यह रही कि इसमें 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) की हिस्सेदारी 58 प्रतिशत रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि कंपनियों ने नए शेयर जारी करने के बजाय पुराने शेयरधारकों की हिस्सेदारी बेचने को ज्यादा प्राथमिकता दी है।
अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच भारत ने अमेरिका से कच्चा तेल मंगाने में काफी तेजी दिखाई है और अब इसकी हिस्सेदारी 4.6% से बढ़कर 8.1% हो गई है। इसी दौरान यूएई का हिस्सा भी 9.4% से बढ़कर 11.1% पहुंच गया है। मिस्र, नाइजीरिया और लीबिया जैसे देशों से भी अब पहले के मुकाबले ज्यादा तेल मंगाया जा रहा है। ये आंकड़े साफ करते हैं कि भारत अब तेल के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय कई देशों से डील कर रहा है ताकि एनर्जी की जरूरतें पूरी होती रहें।
भारत का बैंकिंग सिस्टम इस वक्त काफी मजबूत स्थिति में है, जिसका श्रेय बैंकों के पास मौजूद भारी फंड, कम एनपीए और बढ़ते मुनाफे को जाता है। सरकारी और कमर्शियल बैंकों की सुधरी हुई बैलेंस शीट देश की आर्थिक सेहत के लिए बहुत अच्छे संकेत दे रही है। बैंकों के फंसे हुए कर्ज यानी एनपीए में जबरदस्त सुधार हुआ है और यह पिछले कई दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। सितंबर 2025 तक बैंकों का कैपिटल-टू-रिस्क रेश्यो यानी CRAR भी 17.2% के मजबूत स्तर पर बना हुआ है, जो दिखाता है कि हमारे बैंक किसी भी बड़े आर्थिक झटके को झेलने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि गिग वर्कर्स यानी जो लोग ऐप या प्लेटफॉर्म के जरिए पार्ट-टाइम काम करते हैं, उनके लिए काम की शर्तें नए सिरे से तय करने की जरूरत है। इसके लिए एक नई पॉलिसी लाने का सुझाव दिया गया है ताकि इन कामगारों को बेहतर सोशल सिक्योरिटी और काम का सही माहौल मिल सके। सर्वे का मानना है कि बदलते दौर में इन अस्थायी वर्कर्स के लिए नियमों को अपडेट करना अब काफी जरूरी हो गया है।
दुनिया भर में चल रही उथल-पुथल के बीच आर्थिक सर्वे का कहना है कि फिलहाल निराश होने जैसी कोई बात नहीं है, लेकिन हमें सतर्क रहने की बहुत जरूरत है। सरकार अपनी वित्तीय सेहत सुधारने के लिए राजकोषीय घाटे को कम करने के टारगेट पर सही तरीके से आगे बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। इससे साफ पता चलता है कि सरकार अपने खर्चों को कंट्रोल में रखने और बजट को बैलेंस करने के लिए पूरी तरह से तैयार है।
आर्थिक समीक्षा में एक दिलचस्प बात कही गई है कि रुपये की कीमत में आ रही गिरावट असल में नुकसानदेह नहीं है। इसकी वजह यह है कि जब रुपये की वैल्यू कम होती है, तो यह अमेरिकी टैरिफ यानी वहां लगने वाले टैक्स के असर को कम कर देता है।
भारत की आर्थिक हालत दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले काफी बेहतर है और इसकी बड़ी वजह हमारे मजबूत फंडामेंटल्स हैं। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक सरकार ने जो सुधार किए हैं, उनका असर अब दिखने लगा है और इसी वजह से आने वाले समय में देश की ग्रोथ 7% के आसपास रहने की उम्मीद है। इसके अलावा सर्वे में यह भी साफ कहा गया है कि अगर भारत को विकसित देश बनना है और दुनिया पर अपना प्रभाव जमाना है, तो इसके लिए एक मजबूत और स्थिर करेंसी होना बहुत जरूरी है।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि दुनिया में भारत की बढ़ती ताकत को देखते हुए हमें अपने सिस्टम और संस्थाओं को और भी ज्यादा मजबूत बनाने की जरूरत है। सर्वे में AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर एक चेतावनी भी दी गई है कि अगर AI से उम्मीद के हिसाब से काम में फायदा नहीं हुआ, तो कंपनियों की जो बहुत ऊंची वैल्यू लगाई जा रही है, वह धड़ाम से गिर सकती है। इसके अलावा रुपये को लेकर सर्वे का मानना है कि भारत की इकोनॉमी जितनी मजबूत है, रुपये की मौजूदा कीमत उसे सही तरह से नहीं दिखा रही है, यानी रुपया अपनी असल मजबूती के मुकाबले कम आंका जा रहा है।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि जीएसटी में किए गए बदलावों और सुधारों ने ग्लोबल मार्केट की अनिश्चितता को भारत के लिए एक बड़े मौके में बदल दिया है। वित्त वर्ष 2026-27 देश की इकोनॉमी के लिए तालमेल बिठाने यानी 'एडजस्टमेंट' वाला साल होगा, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था इन बड़े बदलावों के हिसाब से खुद को ढाल रही है। सर्वे के मुताबिक, दुनिया भर के देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों का पूरा फायदा उठाने के लिए भारत को अपनी फैक्ट्रियों और प्रोडक्शन को और ज्यादा कॉम्पिटिटिव बनाने की जरूरत है। साथ ही, ग्लोबल लेवल पर जारी उथल-पुथल को देखते हुए भारत को अपनी घरेलू ग्रोथ, फाइनेंशियल सुरक्षा और बाजार में नकदी बढ़ाने पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, 4 लेबर कोड नोटिफाई कर दिए गए हैं और अगले कुछ महीनों में इनके नियम लागू होने की उम्मीद है। रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि निवेशक भारत में पैसा लगाने से कतरा रहे हैं, जिसकी बारीकी से जांच होनी चाहिए। साल 2025 में सोने की कीमतें $2,607 से बढ़कर $4,315 प्रति औंस तक पहुंच गईं, जो अमेरिकी डॉलर की कमजोरी को दिखाती है। साथ ही, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी FPIs दूसरी और तीसरी तिमाही में खरीदार के बजाय बिकवाल बन गए हैं। ग्लोबल तनाव और ट्रेड की दिक्कतों की वजह से मार्केट में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, जिसमें सरकार के दखल की जरूरत महसूस की जा रही है।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि दुनिया भर में जारी अनिश्चितता को देखते हुए भारत को अपनी घरेलू ग्रोथ पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। इसके लिए पैसों की सुरक्षा और मार्केट में कैश की उपलब्धता बढ़ाने की बात कही गई है। सर्वे के मुताबिक, यूरोप के साथ होने वाला फ्री ट्रेड एग्रीमेंट भारत में फैक्ट्रियों की ताकत, एक्सपोर्ट और रणनीतिक क्षमता को और मजबूत करेगा। हालांकि, पिछले साल विदेशी निवेश में कमी आने की वजह से भारतीय रुपये पर बुरा असर पड़ा है और इसका प्रदर्शन थोड़ा कमजोर रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत की आर्थिक ग्रोथ को देश के भीतर की डिमांड से काफी सहारा मिल रहा है। अच्छी खेती की वजह से गांवों में लोग अब ज्यादा खर्च कर रहे हैं, वहीं शहरों में भी खपत में सुधार देखा गया है। टैक्स में किए गए बदलावों और राहतों की वजह से लोगों के हाथ में अब खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा बच रहा है, जिससे मार्केट में रौनक बढ़ी है। आसान शब्दों में कहें तो खेती में मजबूती और टैक्स में बचत ने आम आदमी की जेब को राहत दी है, जिसका सीधा फायदा देश की इकोनॉमी को मिल रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक, भारत की इकोनॉमी अगले वित्त वर्ष 2027 में 6.8% से 7.2% की रफ्तार से बढ़ सकती है। देश की मजबूत आर्थिक बुनियाद और सरकार द्वारा किए जा रहे सुधारों की वजह से यह ग्रोथ हासिल होने की उम्मीद है। सर्वे में यह भी बताया गया है कि अमेरिका की सख्त टैरिफ नीतियों की वजह से दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर जो दबाव है, उससे निपटने के लिए भारत ने एक खास रणनीति तैयार की है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में इकोनॉमिक सर्वे 2026 की कॉपी टेबल कर दी है। इसके साथ ही देश की आर्थिक सेहत का पूरा ब्योरा संसद के सामने आ गया है। इस रिपोर्ट के पेश होने के बाद अब सबकी नजरें दोपहर 2:30 बजे होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस पर टिकी हैं, जहां देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार यानी CEA डॉ. वी अनंत नागेश्वरन मीडिया से बात करेंगे। इस कॉन्फ्रेंस में वो सर्वे की बारीकियों को आसान भाषा में समझाएंगे और बताएंगे कि आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार कैसी रहने वाली है।
बजट सेशन की शुरुआत 28 जनवरी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के भाषण के साथ हो चुकी है। आज यानी 29 जनवरी को सुबह 11 बजे देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन इकोनॉमिक सर्वे पेश करेंगे। सबसे खास बात यह है कि इस बार 1 फरवरी को रविवार होने के बावजूद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सुबह 11 बजे देश का बजट पेश करेंगी। बजट सेशन का पहला हिस्सा 13 फरवरी तक चलेगा, जिसके बाद 9 मार्च से दूसरा हिस्सा शुरू होगा। पूरा सेशन 2 अप्रैल को खत्म होगा, जिसमें देश की आर्थिक दिशा और नई नीतियों पर लंबी चर्चा की जाएगी।
इकोनॉमिक सर्वे को आप सरकार का 'रिपोर्ट कार्ड' समझ सकते हैं, जो बजट से ठीक 1 दिन पहले आता है। यह हमें बताता है कि पिछले 1 साल में देश की आर्थिक सेहत कैसी रही और नई पॉलिसी आने से पहले इंडिया फाइनेंस के मामले में कहां खड़ा है। इससे सरकार के सोचने के तरीके का पता चलता है और यह भी साफ हो जाता है कि आने वाले समय में कौन से सेक्टर चमक सकते हैं। आसान शब्दों में कहें तो यह बजट की वो नींव है, जिस पर आगे के बड़े फैसले और नीतियां टिकाई जाती हैं।
28 जनवरी को दिए संसद के बजट सेशन की शुरुआत के अपने भाषण में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बताया कि पिछले 11 साल में देश की आर्थिक नींव बहुत मजबूत हुई है और सरकारी नीतियों की वजह से लोगों की कमाई भी बढ़ी है। उन्होंने खास तौर पर यूरोपीय यूनियन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का जिक्र किया और कहा कि इससे मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को काफी बढ़ावा मिलेगा और युवाओं के लिए नौकरियों के नए मौके खुलेंगे। राष्ट्रपति ने यह भी बताया कि 2025 में लागू हुए जीएसटी 2.0 सुधारों से आम जनता के करीब 1 लाख करोड़ रुपये बचे हैं। इसके अलावा इनकम टैक्स में 12 लाख रुपये तक की छूट को उन्होंने मिडिल क्लास के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक कदम बताया।
मार्केट के खिलाड़ी इस समय इकोनॉमिक सर्वे की उन बातों पर नजर गड़ाए बैठे हैं जिनसे ग्लोबल रिस्क और सरकार की कमाई-खर्च के बैलेंस यानी फिस्कल कंसोलिडेशन का पता चलेगा। बाजार को उम्मीद है कि सर्वे से यह हिंट मिलेगा कि आगे चलकर इक्विटी, बॉन्ड और करेंसी मार्केट की चाल कैसी रहने वाली है। असल में यह सर्वे एक तरह का फ्रेमवर्क तैयार कर देता है, जिससे पता चलता है कि कल आने वाले बजट और आने वाले समय में आर्थिक फैसले किस दिशा में लिए जाएंगे। यही वजह है कि इन्वेस्टर और ट्रेडर्स इस रिपोर्ट के हर पहलू को बारीकी से समझ रहे हैं।
बजट सत्र के शुरू होने पर पीएम मोदी ने कहा कि 21वीं सदी का पहला क्वार्टर खत्म हो चुका है और अब दूसरे क्वार्टर की शुरुआत हो रही है। उन्होंने इस बजट को बहुत खास बताया क्योंकि यह सदी के दूसरे क्वार्टर का पहला बजट है। पीएम ने जोर देकर कहा कि 2047 तक भारत को एक विकसित देश बनाने के लिए अगले 25 साल का यह फेज बहुत जरूरी है। उनके मुताबिक, यह बजट उस बड़े लक्ष्य की नींव रखने वाला है जो आने वाले सालों में देश की अर्थव्यवस्था और विकास की दिशा तय करेगा।
संसद के बजट सेशन की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया से बात करते हुए कई अहम बातें कहीं। उन्होंने कहा कि आज का दिन भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा है क्योंकि आज इकोनॉमिक सर्वे पेश किया जा रहा है। पीएम ने उम्मीद जताई कि यह सत्र देश की तरक्की को नई दिशा देगा और इसमें होने वाली चर्चाओं से आम जनता को फायदा पहुंचेगा। उन्होंने सभी सांसदों से आग्रह किया कि वे सदन की कार्यवाही में सहयोग दें और देश के विकास से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से बात करें। पीएम का मानना है कि दुनिया की नजरें इस वक्त भारत के बजट और आर्थिक आंकड़ों पर टिकी हैं।
इकोनॉमिक सर्वे के डॉक्यूमेंट को दो हिस्सों में बांटा गया है, जिन्हें पार्ट A और पार्ट B कहा जाता है। पार्ट A में साल भर के बड़े आर्थिक बदलावों और पूरी इकोनॉमी का एक बड़ा रिव्यू होता है। वहीं पार्ट B में खास सामाजिक और आर्थिक मुद्दों के बारे में डिटेल में जानकारी दी जाती है। आसान शब्दों में कहें तो पार्ट A देश की आर्थिक सेहत की बड़ी तस्वीर दिखाता है, जबकि पार्ट B आम जनता और समाज से जुड़े खास पहलुओं पर फोकस करता है।
भारत का पहला आर्थिक सर्वेक्षण साल 1950-51 में केंद्रीय बजट के साथ पेश किया गया था। लेकिन 1964 के बाद से इसे बजट से अलग करके पेश किया जाने लगा। तब से लेकर आज तक आर्थिक सर्वेक्षण को बजट से 1 दिन पहले अलग से पेश करने की परंपरा चली आ रही है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के मुताबिक वित्त वर्ष 2025 में भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ 6.4% रहने का अंदाजा लगाया गया था। इस बढ़त के पीछे खेती और सर्विस सेक्टर का अच्छा प्रदर्शन और गांवों में बढ़ती डिमांड को बड़ी वजह माना गया। वहीं वित्त वर्ष 2026 के लिए नजरिया मिला-जुला यानी बैलेंस रखा गया है, क्योंकि दुनिया भर में चल रहे तनाव, व्यापारिक उतार-चढ़ाव और सामानों की कीमतों में अचानक आने वाले झटकों की वजह से कुछ रिस्क बना हुआ है।
शेयर बाजार के निवेशकों और व्यापार जगत के लिए यह सर्वे बहुत मायने रखता है। बाजार के खिलाड़ी वैश्विक जोखिमों और राजकोषीय मजबूती को लेकर सरकार की टिप्पणियों का इंतजार कर रहे हैं। इस सर्वे में दी गई जानकारी से इक्विटी, बॉन्ड और मुद्रा बाजार की धारणा प्रभावित होती है। सर्वेक्षण में शामिल सेक्टरवार रुझान यह तय करते हैं कि आने वाले समय में किन क्षेत्रों में सरकार ज्यादा निवेश या रियायतें दे सकती है। इसलिए आज आने वाली यह रिपोर्ट न केवल सरकार बल्कि आम आदमी और निवेशकों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।
आर्थिक सर्वेक्षण को आज गुरुवार सुबह 11:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे के बीच संसद में पेश किए जाने की संभावना है। वित्त मंत्री द्वारा इसे सदन में रखे जाने के बाद देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन एक मीडिया ब्रीफिंग करेंगे। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में वह सर्वे की बारीकियों और देश की विकास दर से जुड़े अहम पहलुओं पर विस्तार से रोशनी डालेंगे। आपको बता दें कि इस सर्वे के ठीक दो दिन बाद यानी रविवार 1 फरवरी को वित्त मंत्री मोदी सरकार का अगला आम बजट पेश करेंगी।
इस बार के आर्थिक सर्वेक्षण में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सबका ध्यान रहने वाला है। इसमें मुख्य रूप से जीडीपी यानी विकास दर के रुझान, महंगाई की स्थिति और मौद्रिक नीति पर चर्चा की जाएगी। इसके अलावा देश की राजकोषीय स्थिति, निर्यात और आयात का प्रदर्शन और विदेशी मुद्रा भंडार जैसे आंकड़ों पर भी रिपोर्ट दी जाएगी। सामाजिक क्षेत्र की बात करें तो रोजगार के आंकड़े, स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति पर विशेष अध्याय होने की उम्मीद है। बाजार के विशेषज्ञ इन आंकड़ों के जरिए यह समझने की कोशिश करेंगे कि सरकार की प्राथमिकताएं आने वाले समय में क्या होने वाली हैं।
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