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4 min read | अपडेटेड January 29, 2026, 14:57 IST
सारांश
Economic Survey 2025-26: आर्थिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद बहुत मजबूत है, लेकिन रुपया अपनी असली क्षमता से कम प्रदर्शन कर रहा है। सर्वे ने साल 2026 के लिए तीन वैश्विक संकटों की चेतावनी दी है। भारत को इन चुनौतियों से निपटने के लिए विकास की रफ्तार और सुरक्षा कवच, दोनों पर एक साथ काम करना होगा।

वित्त मंत्री ने आर्थिक सर्वे 2025-26 को पेश कर दिया है।
आर्थिक सर्वे 2025-26 ने भारतीय अर्थव्यवस्था की एक मिली-जुली तस्वीर पेश की है। एक ओर जहां भारत की आर्थिक बुनियाद यानी फंडामेंटल्स बहुत ही शानदार और मजबूत बताए गए हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय रुपया अपनी असली ताकत के मुकाबले थोड़ा कमजोर प्रदर्शन कर रहा है। सर्वे के अनुसार, देश में विकास की गति अच्छी है, महंगाई नियंत्रण में है, बैंकों की सेहत सुधरी है और कॉर्पोरेट बैलेंस शीट भी मजबूत है। इसके बावजूद रुपया उस मजबूती को नहीं दिखा पा रहा है जिसका वह हकदार है। इसकी एक बड़ी वजह भारत का व्यापार घाटा है। भारत वस्तुओं के व्यापार में घाटे में रहता है और सेवाओं से होने वाली कमाई व विदेशों से आने वाला पैसा इस घाटे को पूरी तरह भरने के लिए पर्याप्त नहीं हो पा रहा है। यही कारण है कि जब विदेशी पूंजी का प्रवाह कम होता है, तो रुपये की स्थिरता पर असर पड़ता है।
सर्वे में ऑस्ट्रेलिया के लोवी इंस्टीट्यूट के 'पावर गैप इंडेक्स' का हवाला देते हुए बताया गया है कि भारत अपनी पूरी रणनीतिक क्षमता से कम पर काम कर रहा है। भारत का पावर गैप स्कोर -4.0 है, जो रूस और उत्तर कोरिया को छोड़कर एशिया में सबसे कम है। इसका मतलब है कि भारत के पास संसाधन और क्षमता तो है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों के कारण वह उनका पूरा लाभ नहीं उठा पा रहा है। 145 करोड़ की आबादी वाला यह देश एक पीढ़ी के भीतर अमीर बनने की आकांक्षा रखता है, लेकिन वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता और बड़े देशों के बीच बढ़ते तनाव भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के सामने कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। इन चुनौतियों को दूर करने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र और आम नागरिकों को मिलकर प्रयास करने होंगे।
आर्थिक सर्वे ने साल 2026 के लिए दुनिया के सामने तीन संभावित स्थितियां रखी हैं। पहला सीनारियो वह है जिसमें दुनिया वैसी ही बनी रहेगी जैसी 2025 में थी, लेकिन वह और अधिक असुरक्षित और नाजुक हो जाएगी। इसमें छोटी सी घटना भी बड़े संकट का रूप ले सकती है। इसकी संभावना 40 से 45 प्रतिशत है। दूसरा सीनारियो और भी गंभीर है, जिसमें दुनिया के देशों के बीच आपसी टकराव इतना बढ़ जाएगा कि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है। इसमें व्यापार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाएगा और देशों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए जाएंगे। इसकी संभावना भी 40 से 45 प्रतिशत जताई गई है।
तीसरा और सबसे खतरनाक सीनारियो वह है जिसमें वित्तीय, तकनीकी और भू-राजनीतिक संकट एक साथ मिलकर पूरी दुनिया को हिला देंगे। सर्वे में विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के सेक्टर में हो रहे भारी भरकम निवेश और उससे जुड़े फाइनेंशियल रिस्क की चेतावनी दी गई है। अगर AI तकनीक से जुड़ा यह बुलबुला फूटता है, तो इसके परिणाम 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से भी ज्यादा भयानक हो सकते हैं। इसकी संभावना 10 से 20 प्रतिशत के बीच है।
इन वैश्विक खतरों के बीच भारत के लिए राहत की बात यह है कि इसका घरेलू बाजार बहुत बड़ा है और इसके पास विदेशी मुद्रा का अच्छा भंडार है। सर्वे का कहना है कि भारत को अब एक ऐसी रणनीति पर चलना होगा जिसे 'मैराथन और स्प्रिंट' का नाम दिया गया है। इसका मतलब है कि भारत को लंबी अवधि के विकास की मैराथन भी दौड़नी है और साथ ही अचानक आने वाले वैश्विक झटकों से बचने के लिए स्प्रिंट जैसी तेज रफ्तार और सतर्कता भी दिखानी होगी। भारत को अपनी आयात जरूरतों को पूरा करने के लिए निर्यात से होने वाली कमाई बढ़ानी होगी। 2026 में नीतिगत साख और प्रशासनिक अनुशासन भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्ति साबित होंगे।
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