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3 min read | अपडेटेड January 19, 2026, 14:56 IST
सारांश
Budget 2026: इकोनॉमिक सर्वे यानी आर्थिक समीक्षा सरकार का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो बजट से ठीक एक दिन पहले पेश किया जाता है। यह पिछले एक साल में देश की आर्थिक सेहत का पूरा लेखा-जोखा देता है।

देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
Budget 2026: बजट 2026 को लेकर देश भर में चर्चाएं तेज हो गई हैं। हर साल जब वित्त मंत्री संसद में बजट पेश करते हैं, तो उससे ठीक एक दिन पहले एक और बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज पटल पर रखा जाता है, जिसे 'आर्थिक समीक्षा' या 'इकोनॉमिक सर्वे' कहा जाता है। इसे सरल भाषा में भारत सरकार का 'रिपोर्ट कार्ड' भी कह सकते हैं। यह सर्वे देश की आर्थिक सेहत का सबसे विश्वसनीय आईना होता है, जिसमें पिछले एक साल की आर्थिक गतिविधियों का विस्तृत ब्यौरा दिया जाता है। इसके जरिए आम जनता और निवेशकों को यह समझने में मदद मिलती है कि देश की अर्थव्यवस्था किस दिशा में बढ़ रही है और आने वाले समय में कौन से सेक्टर चमकने वाले हैं।
इकोनॉमिक सर्वे वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किया जाने वाला एक सालाना दस्तावेज है। इसे मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग की आर्थिक इकाई तैयार करती है। इस पूरे दस्तावेज को तैयार करने की जिम्मेदारी मुख्य आर्थिक सलाहकार की होती है। वर्तमान में यह कार्य मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन के मार्गदर्शन में किया जा रहा है। सर्वे तैयार होने के बाद इसे वित्त मंत्री द्वारा अनुमोदित किया जाता है और फिर बजट सेशन के दौरान संसद में पेश किया जाता है। यह दस्तावेज आधिकारिक रूप से बताता है कि पिछले 12 महीनों के दौरान देश में खेती, उद्योग, सेवा और विदेशी व्यापार जैसे क्षेत्रों का प्रदर्शन कैसा रहा है।
आर्थिक समीक्षा को बजट से पहले पेश करने के पीछे एक बड़ी वजह है। बजट जहां भविष्य की योजनाओं और खर्चों का अनुमान होता है, वहीं सर्वे अतीत के कार्यों और वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करता है। इससे यह पता चलता है कि सरकार ने पिछले बजट में जो लक्ष्य रखे थे, उन्हें किस हद तक हासिल किया गया है। सर्वे में देश की जीडीपी यानी विकास दर के आंकड़े भी दिए जाते हैं, जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले साल में विकास की रफ्तार क्या रहने वाली है। इसे पढ़ने के बाद ही सांसद और आम नागरिक यह बेहतर तरीके से समझ पाते हैं कि वित्त मंत्री बजट में किन नए सुधारों की घोषणा कर सकते हैं।
भारत में आर्थिक सर्वे पेश करने की परंपरा काफी पुरानी है। देश का पहला इकोनॉमिक सर्वे साल 1950-51 में पेश किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि साल 1964 तक इस दस्तावेज को मुख्य बजट के साथ ही पेश किया जाता था। लेकिन बाद में सरकार को महसूस हुआ कि बजट की चर्चा को अधिक तर्कसंगत और डेटा पर आधारित बनाने के लिए इसे एक दिन पहले पेश किया जाना चाहिए। तब से यह परंपरा बन गई कि बजट से ठीक एक दिन पहले इसे संसद में रखा जाता है। यह सर्वे दो भागों में बंटा होता है। एक हिस्सा मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिति यानी पूरी अर्थव्यवस्था पर केंद्रित होता है, जबकि दूसरा हिस्सा स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी जैसे सामाजिक मुद्दों पर डेटा प्रदान करता है।
इकोनॉमिक सर्वे में केवल आंकड़े ही नहीं होते, बल्कि इसमें अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव और सिफारिशें भी शामिल होती हैं। हालांकि, तकनीकी रूप से सरकार इन सुझावों को मानने के लिए कानूनी या संवैधानिक रूप से बाध्य नहीं है। यह पूरी तरह से सरकार पर निर्भर करता है कि वह सर्वे की सिफारिशों को बजट का हिस्सा बनाए या नहीं। इसके बावजूद, नीति निर्माताओं और बड़े निवेशकों के लिए यह एक गाइड की तरह काम करता है।
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