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5 min read | अपडेटेड March 09, 2026, 08:34 IST
सारांश
हाई क्रूड ऑयल कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था पर नेगेटिव प्रभाव डालती हैं, क्योंकि देश अपनी तेल आवश्यकताओं का लगभग 85% आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतों में निरंतर वृद्धि से आयात बिल बढ़ता है, चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ता है और रुपये पर दबाव पड़ता है।

कच्चे तेल की कीमतों में जबर्दस्त तेजी, क्या पेट्रोल-डीजल पर पड़ेगा असर?
ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है और इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर साफ नजर आ रहा है। 2022 के बाद यह पहला मौका है, जब कच्चे तेल की कीमतें 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से पहुंच गई है। भारत में फिलहाल ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी का ऐलान नहीं किया है, हालांकि जिस तरह से कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़ रही है, ऐसा लग रहा है कि भारत में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर इसका असर आने वाले समय में देखने को मिल सकता है। दिल्ली में 8 मार्च को पेट्रोल 94.77 रुपये प्रति लीटर जबकि डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर ही रहा था। बढ़ती जियो-पॉलिटिकल टेंशन ने महंगाई का खतरा बढ़ा दिया है। ईरान युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट में प्रोडक्शन और शिपिंग में मुश्किलें आने के चक्कर में रविवार को तेल की कीमतें 3.5 साल से अधिक समय में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।
इस खबर को लिखे जाने तक डब्ल्यूटीआई क्रूड फ्यूचर्स (अप्रैल अनुबंध) 26.03% की तेजी के साथ 116.11 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 23.49% की तेजी के साथ 116.18 डॉलर पर कारोबार कर रहा था। रविवार को, एपी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिकागो मर्केंटाइल एक्सचेंज में कारोबार फिर से शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत 107.97 डॉलर प्रति बैरल थी, जो शुक्रवार के बंद भाव 92.69 डॉलर से 16.5% अधिक थी।
अमेरिका में उत्पादित हल्का और मीठा कच्चा तेल, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट, लगभग 106.22 डॉलर प्रति बैरल पर बिक रहा था। यह शुक्रवार को बंद हुए 90.90 डॉलर से 16.9% अधिक था।
पिछले सप्ताह अमेरिकी कच्चे तेल की कीमतों में 36% और ब्रेंट क्रूड में 28% की वृद्धि के बाद ये बढ़ोतरी हुई है। तेल की कीमतों में उछाल इसलिए आया है क्योंकि युद्ध, जो अब दूसरे सप्ताह में जा चुका है, ने उन देशों और क्षेत्रों को भी अपनी चपेट में ले लिया है जो फारस की खाड़ी से तेल और गैस के प्रोडक्शन और ट्रांसपोर्टेशन के लिए अहम हैं। इंडिपेंडेंट रिसर्च फर्म रायस्टैड एनर्जी के मुताबिक, लगभग 1.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल - दुनिया के तेल का लगभग 20% - आमतौर पर हर दिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर भेजा जाता है।
ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले टैंकरों के लिए आवाजाही लगभग पूरी तरह रोक दी है। उत्तर में ईरान से सटे इस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सऊदी अरब, कुवैत, इराक, कतर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान से तेल और गैस ले जाने वाले टैंकर आते-जाते रहते हैं।
पांचवें सबसे बड़े उत्पादक कुवैत ने शनिवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों के सुरक्षित आवाजाही के खिलाफ ईरानी खतरों का हवाला देते हुए एहतियाती तौर पर अपने तेल उत्पादन और रिफाइनरी उत्पादन में कटौती की घोषणा की। सीएनबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी स्वामित्व वाली कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन ने कटौती की मात्रा की डीटेल्स नहीं दी। ओपेक में दूसरे सबसे बड़े उत्पादक इराक में उत्पादन लगभग ठप हो गया है। उद्योग के तीन अधिकारियों ने रविवार को रॉयटर्स को बताया कि इसके तीन मुख्य दक्षिणी तेल क्षेत्रों से उत्पादन 70% गिरकर 13 लाख बैरल प्रति दिन हो गया है। ईरान युद्ध से पहले इन क्षेत्रों में 43 लाख बैरल प्रति दिन का उत्पादन होता था।
ओपेक में तीसरे सबसे बड़े उत्पादक, संयुक्त अरब अमीरात ने शनिवार को कहा कि वह ‘भंडारण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपतटीय उत्पादन स्तरों का सावधानीपूर्वक प्रबंधन कर रहा है।’ अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (एडीएएनओसी) ने कहा कि उसके तटवर्ती परिचालन सामान्य रूप से जारी हैं। खाड़ी अरब देश उत्पादन में कटौती कर रहे हैं क्योंकि उनके पास भंडारण स्थान कम होता जा रहा है, क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने के कारण तेल के बैरल जमा हो रहे हैं और उन्हें रखने की कोई जगह नहीं है। टैंकर संकरे जलमार्ग से गुजरने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उन्हें डर है कि ईरान उन पर हमला कर सकता है। तेल की कीमत 2022 के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंची। अमेरिकी कच्चे तेल के वायदा भाव आखिरी बार 30 जून, 2022 को 105.76 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर थे। ब्रेंट क्रूड के लिए, यह 29 जुलाई, 2022 को था, जब कीमत 104 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी।
हाई क्रूड ऑयल कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था पर नेगेटिव प्रभाव डालती हैं, क्योंकि देश अपनी तेल आवश्यकताओं का लगभग 85% आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतों में निरंतर वृद्धि से आयात बिल बढ़ता है, चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ता है और रुपये पर दबाव पड़ता है। इससे ईंधन, परिवहन और विनिर्माण लागत में वृद्धि के कारण मंहगाई भी बढ़ती है, जिससे अंत में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। उच्च कच्चे तेल की कीमतें सब्सिडी के बोझ में वृद्धि के कारण सरकारी वित्त पर दबाव डाल सकती हैं और आर्थिक विकास को भी प्रभावित कर सकती हैं, क्योंकि बढ़ती इनपुट लागतें कंपनियों के मार्जिन और उपभोक्ता खर्च को प्रभावित करती हैं।
अपस्ट्रीम कंपनियां (ONGC, ऑयल इंडिया), ओएमसी (IOCL, BPCL, HPCL), पेंट (एशियन पेंट्स, कंसाई नेरोलैक), टायर (MRF, JK टायर्स, अन्य) और एविएशन सेक्टर पर ध्यान केंद्रित रहेगा।
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