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SEBI चेयरपर्सन पद के लिए आवेदन मांगे गए, माधबी पुरी बुच का कार्यकाल होने वाला है पूरा

Upstox

3 min read | अपडेटेड January 27, 2025, 18:28 IST

सारांश

SEBI के चेयरपर्सन पद के लिए आवेदन मांगे गए हैं। चेयरपर्सन का कार्यकाल 5 साल या 65 साल की उम्र तक रहता है, जो भी कम हो।

अपने कार्यकाल के आखिरी साल में विवादों में घिरी रहीं बुच।

अपने कार्यकाल के आखिरी साल में विवादों में घिरी रहीं बुच।

सिक्यॉरिटीज ऐंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) की चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच का तीन साल का कार्यकाल 28 फरवरी को पूरा होने जा रहे हैं। इसके चलते सरकार ने अब इस पद के लिए आवेदन मांगे हैं। बुच ने मार्च 2, 2022 में पदभार संभाला था।

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वित्त मंत्रालय के वित्त मामलों के विभाग ने 17 फरवरी तक आवेदन मांगे हैं। यह नियुक्ति अधिकतम 5 साल के लिए या चेयरपर्सन के 65 साल की उम्र तक के लिए होगा, जो भी पहले हो। इस पद के लिए कैंडिडेट की उम्र 50 साल से ज्यादा और प्रफेशनल एक्सपीरियंस 25 साल से ज्यादा होना चाहिए।

इसके अलावा सिक्यॉरिटी मार्केट से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने की क्षमता या कानून, फाइनेंस, आर्थिक मामलों, अकाउंटेंसी जैसे विषयों में अच्छी समझ होनी चाहिए, जो केंद्र सरकार के मुताबिक बोर्ड के काम आएगी। चेयरपर्सन को भारत सरकार के सचिव के बराबर ₹5,62,500 प्रतिमाह वेतन मिलेगा। ** और पढ़ें: Hindenburg Research: गौतम अडानी के खिलाफ रिपोर्ट छापने वाला शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च बंद**

नोटिफिकेशन में यह भी कहा गया है कि चेयरपर्सन ऐसा इंसान होना चाहिए जिसके वित्तीय या किसी और हितों का असर चेयरपर्सन के तौर पर पद की जिम्मेदारियों पर ना पड़े।

सरकार फाइनेंशियल सेक्टर रेग्युलेटरी अपॉइंटमेंट्स सर्च कमिटी के सुझाव पर सेबी चेयर की नियुक्ति करती है। यह कमिटी मेरिट के आधार पर ऐसे किसी शख्स को भी नामित कर सकती है जिसने अलग से आवेदन ना किया हो। इसकी अध्यक्षता कैबिनेट सेक्रटरी करते हैं।

बूच सेबी की पहली महिला चेयर हैं। वह प्राइवेट सेक्टर से आने वाली इस पद की पहली चेयरपर्सन भी हैं। इसके पहले वह सेबी की सदस्य रही थीं। अपने कार्यकाल के दौरान इक्विटी के तेज सेटलमेंट, FPI डिस्क्लोजर को बेहतर करने और म्यूचुअल फंड की पहुंच को बढ़ाने के लिए उन्होंने कई कदम उठाए।

अपने कार्यकाल के आखिरी साल में वह कांग्रेस के साथ-साथ शॉर्टसेलर हिंडनबर्ग के निशाने पर रहीं। हिंडनबर्ग रिसर्च ने उनके ऊपर हितों के टकराव (conflict of interestion) का आरोप लगाया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि उन्होंने जानबूझकर अडानी ग्रुप के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोपों की सही से जांच नहीं होने दी।

बूच ने सफाई दी थी कि उनके जो निवेश से अडानी ग्रुप से जुड़े थे वह सेबी चेयर के पद पर आने के पहले के थे और उन्होंने इन निवेश को लेकर सभी जानकारी सामने पहले ही रख दी थी।

सरकार ने भी यह नहीं बताया था कि उसने बूच से इस बारे में कोई जानकारी मांगी है या नहीं। यही नहीं, उन्हें सेबी के कर्मचारियों की ओर से भी विरोध झेलना पड़ा। कहा जा रहा था कि रेग्युलेटर के अंदर का माहौल काफी नकारात्मक है।

लेखकों के बारे में

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Upstox Hindi News Desk पत्रकारों की एक टीम है जो शेयर बाजारों, अर्थव्यवस्था, वस्तुओं, नवीनतम व्यावसायिक रुझानों और व्यक्तिगत वित्त को उत्साहपूर्वक कवर करती है।

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