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4 min read | अपडेटेड January 20, 2026, 13:21 IST
सारांश
विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum, WEF) की सालाना बैठक से इतर तांती ने कहा कि कंपनी को इस बात पर गर्व है कि वह विंड एनर्जी सेक्टर में टिके रहने वाली केवल पांच ग्लोबल कंपनियों में से एक है। अन्य चार कंपनियां अमेरिका की जीई और यूरोप की सीमेंस, वेस्टास और नॉर्डेक्स हैं।
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सुजलॉन का क्या है एक्सपेंशन प्लान?
भारत में पवन ऊर्जा (Wind Energy) सेक्टर की टॉप कंपनियों में शुमार सुजलॉन एनर्जी के उपाध्यक्ष गिरीश तांती ने कहा कि भारत में जब पहली बार पवन चक्कियां लगाई गईं तो लोग उनका मजाक उड़ाते थे और कहते थे कि ये बड़े-बड़े ‘पंखे’ बिजली पैदा करने के बजाय उसे खा जाएंगे, लेकिन अब भारत निर्यात के जरिए ग्लोबल विंड एनर्जी डिमांड का 10% पूरा करने में सक्षम है। सुजलॉन ने अपने 30 साल के अस्तित्व में एक लंबा सफर तय किया है। संस्थापक सदस्य के अनुसार अब कंपनी विंड एनर्जी प्रोडक्शन बिजनेस के अंदर और उससे बाहर एक्सपेंशन के लिए अपनी विंड 2.0 और सुजलॉन 2.0 पहलों के साथ विकास के अपने अगले चरण के लिए तैयार है।
विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum, WEF) की सालाना बैठक से इतर तांती ने कहा कि कंपनी को इस बात पर गर्व है कि वह विंड एनर्जी सेक्टर में टिके रहने वाली केवल पांच ग्लोबल कंपनियों में से एक है। अन्य चार कंपनियां अमेरिका की जीई और यूरोप की सीमेंस, वेस्टास और नॉर्डेक्स हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सुजलॉन, ‘ग्लोबल साउथ’ की इकलौती कंपनी है।
तांती ने कहा कि यह 30 साल का सफर बेहद फायदेमंद रहा है खासकर तब जब इसकी शुरुआत ऐसे समय से हुई थी जब विंड एनर्जी को व्यवहार्य नहीं माना जाता था। उन्होंने कहा कि भारत की करीब 50% एनर्जी जरूरत अब रिन्यूएबल सोर्सेज से पूरी होती है और देश 2070 तक 100% कार्बन तटस्थ बनने के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। सुजलॉन के शुरुआती दिनों को याद करते हुए तांती ने बताया कि लोग पूछते थे कि ये पवनचक्कियां क्यों लगाई जा रही हैं क्योंकि ये बहुत अधिक बिजली की खपत करती हैं।
उन्होंने कहा कि अब एक ‘टरबाइन’ करीब एक करोड़ यूनिट प्रति वर्ष बिजली उत्पन्न कर सकती है जिसका मतलब है कि एक ‘टरबाइन’ पूरे गांव को बिजली देने के लिए पर्याप्त है। तांती ने कहा कि वैल्यू चेन में हमारे साथ 2,500 से अधिक सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) काम कर रहे हैं और भारत में अब निर्यात के माध्यम से ग्लोबल विंड एनर्जी की मांग का लगभग 10% पूरा करने की क्षमता है।
ग्रुप के एक्सपेंशन प्लान के बारे में उन्होंने कहा कि विंड 2.0 विंड एनर्जी बिजनेस के दृष्टिकोण को पुनर्परिभाषित कर रहा है जिसमें उत्पाद विकास को एक अलग विभाग के रूप में, ईपीसी (इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण) और सेवा व्यवसायों सहित विभिन्न तत्वों को जोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि डिजिटल बदलाव, ग्राहकों को बेहतर सेवा प्रदान करना और कार्यस्थल पर सुरक्षा जैसे उपायों से इन लक्ष्यों को और भी बल मिलेगा। तांती ने कहा कि सभी कंपनियां अब ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर हैं और यह भारत के विकास के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि हमारी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि दर को बनाए रखने के लिए है।
उन्होंने कहा कि 2047 तक जीडीपी को 10 गुना बढ़ाने का मतलब है कि एनर्जी की मांग भी 10 गुना बढ़ जाएगी। हमारे मध्यम वर्ग का आकार भी काफी बढ़ जाएगा, जो उस अवधि में दोगुना होने की संभावना है जिससे ऊर्जा की मांग में और भी अधिक वृद्धि होगी। तांती ने कहा कि चूंकि हम पहले से ही अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयात कर रहे हैं, इसलिए यह ऊर्जा सुरक्षा का खतरा उत्पन्न करता है। उन्होंने कहा कि इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है जबकि पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में जलवायु और कार्बन उत्सर्जन की लागत भी शामिल होती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल और डेटा सेंटरों द्वारा भारी मात्रा में बिजली की खपत के बारे में उन्होंने कहा कि भारत में योजनाबद्ध अधिकतर नए डेटा सेंटर पहले दिन से ही पर्यावरण के अनुकूल होंगे। उन्होंने कहा कि सरल शब्दों में कहें तो, एक ही खोज के लिए चैटजीपीटी द्वारा खपत गूगल की तुलना में 10 गुना है लेकिन परिणाम भी अलग हैं।
**PTI इनपुट **
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