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3 min read | अपडेटेड January 28, 2026, 13:27 IST
सारांश
यह मुद्दा लंबे समय से केंद्र एवं राज्यों, खासकर विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के बीच विवाद का विषय रहा है जिनका कहना है कि उन्हें उनका उचित हिस्सा नहीं मिला है। दक्षिणी राज्यों ने भी जनसंख्या को विकेंद्रीकरण के मानदंड के रूप में उपयोग किए जाने पर आपत्ति जताई है।

बजट 2026 में शामिल की जाएंगी 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें
1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण केंद्रीय बजट पेश करेंगी। इस बजट में 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें शामिल होंगी, जिसने पहले ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। संविधान के तहत गठित वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के बीच करों के बंटवारे का सूत्र देता है। केंद्र द्वारा लगाए गए उपकर और अधिभार विभाज्य निधि का हिस्सा नहीं हैं। वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों पर सुझाव देता है और समय-समय पर गठित किया जाता है।
नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में 16वें वित्त आयोग का गठन 31 दिसंबर 2023 को किया गया था। पनगढ़िया के नेतृत्व में वित्त आयोग के सदस्यों सेवानिवृत्त नौकरशाह एनी जॉर्ज मैथ्यू, अर्थशास्त्री मनोज पांडा, एसबीआई ग्रुप के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्या कांति घोष और आरबीआई के डिप्टी गवर्नर टी रबी शंकर और आयोग के सचिव ऋत्विक पांडे ने 17 नवंबर 2025 को मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को भी रिपोर्ट की एक कॉपी सौंपी।
हालांकि 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट पब्लिक नहीं की गई है, लेकिन केंद्र सरकार हमेशा आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करती रही है। संबंधित शर्तों (टीओआर) के अनुसार, 16वें आयोग को 1 अप्रैल 2026 से शुरू होने वाली पांच साल की अवधि को शामिल करते हुए अपनी रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया था। इसमें केंद्र और राज्यों के बीच करों की शुद्ध आय के वितरण के साथ-साथ राज्यों के बीच ऐसी आय के संबंधित हिस्सों के आवंटन, राज्यों को अनुदान सहायता, आपदा प्रबंधन पहलों के वित्तपोषण पर व्यवस्थाओं की समीक्षा आदि पर सिफारिशें शामिल हैं।
एन. के. सिंह के नेतृत्व में गठित पूर्व 15वें वित्त आयोग ने सिफारिश की थी कि राज्यों को छह साल की अवधि यानी 2020-21 से 2025-26 के दौरान केंद्र के विभाज्य कर कोष का 41% हिस्सा दिया जाए जो कि 14वें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित स्तर के बराबर है। ऐतिहासिक रूप से, वित्त आयोग राज्यों के केंद्रीय करों में हिस्सेदारी का निर्धारण जनसंख्या, क्षेत्रफल, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन, राजकोषीय प्रयास, आय अंतर और वन क्षेत्र के भारित योग के आधार पर करते रहे हैं।
यह मुद्दा लंबे समय से केंद्र एवं राज्यों, खासकर विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के बीच विवाद का विषय रहा है जिनका कहना है कि उन्हें उनका उचित हिस्सा नहीं मिला है। दक्षिणी राज्यों ने भी जनसंख्या को विकेंद्रीकरण के मानदंड के रूप में उपयोग किए जाने पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में उनकी सफलता के बावजूद यह उनके साथ अन्याय करता है। गौरतलब है कि 15वें वित्त आयोग ने जनसंख्या को 15%, क्षेत्रफल को 15%, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन को 12.5%, वन आवरण एवं पारिस्थितिकी को 10% और कर एवं राजकोषीय प्रयासों को 2.5% भार दिया था।
भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाई.वी. रेड्डी के नेतृत्व में 14वें वित्त आयोग ने कर वितरण को विभाज्य निधि के 32% से बढ़ाकर 42% कर दिया जो कि 13वें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित था। 14वें वित्त आयोग की ये अनुशंसाएं 1 अप्रैल 2015 से 31 मार्च 2020 तक लागू रहीं।
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