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4 min read | अपडेटेड March 01, 2026, 14:32 IST
सारांश
मिडिल ईस्ट में मचे कोहराम के बीच 'होर्मुज स्ट्रेट' फिर से चर्चा में है। ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत और अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद खबर है कि ईरान ने इस समुद्री रास्ते को बंद कर दिया है। अगर ऐसा होता है, तो दुनिया भर में तेल की सप्लाई रुक सकती है और भारत में महंगाई भी बढ़ सकती है।

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है।
मिडिल ईस्ट में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के बड़े सैन्य हमले के बाद वहां के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर ने पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया है। इस घटना के बाद से ही दुनिया भर के देशों की सांसें थमी हुई हैं और सबकी नजरें एक संकरे समुद्री रास्ते पर टिकी हैं, जिसे 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' कहा जाता है। ताजा रिपोर्टों की मानें तो ईरान ने इस रास्ते से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों की आवाजाही पर रोक लगा दी है। हालांकि अभी तक ईरान की तरफ से कोई ऑफिशियल बयान नहीं आया है, लेकिन इस एक कदम ने दुनिया भर के बाजारों में खलबली मचा दी है।
होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर के तेल व्यापार का असली बादशाह है। अगर नक्शे पर देखें तो यह फारस की खाड़ी को हिंद महासागर से जोड़ने वाला इकलौता गेट है। इसके उत्तर में ईरान है और दक्षिण में ओमान और यूएई जैसे देश बसे हैं। यह रास्ता करीब 161 किलोमीटर लंबा है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती इसकी चौड़ाई है। अपने सबसे संकरे हिस्से में यह महज 33 किलोमीटर ही चौड़ा रह जाता है। यहां पानी इतना उथला है कि बड़े जहाजों के निकलने के लिए बनी लेन सिर्फ दो मील ही चौड़ी है। यही वजह है कि इसे दुनिया का सबसे संवेदनशील इलाका माना जाता है।
खाड़ी देशों के लिए अपना तेल दुनिया तक पहुंचाने का इसके अलावा कोई दूसरा समुद्री रास्ता नहीं है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (U.S. Energy Information Administration - EIA) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्र के रास्ते होने वाले दुनिया के कुल कच्चे तेल के व्यापार का 20 से 25 पर्सेंट हिस्सा अकेले इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे बड़े ओपेक देशों का तेल एशियाई बाजारों तक इसी रूट से पहुंचता है। इतना ही नहीं, कतर की पूरी LNG सप्लाई भी इसी रास्ते पर टिकी है। हर रोज यहां से 2 करोड़ बैरल से ज्यादा कच्चा तेल गुजरता है। अगर यह रास्ता बंद होता है, तो पूरी दुनिया की एनर्जी सप्लाई चेन टूट जाएगी।
जब भी ईरान और अमेरिका या इजरायल के बीच तनाव बढ़ता है, तो होर्मुज स्ट्रेट एक बड़े हथियार में बदल जाता है। इस संकरे रास्ते पर ईरान की पकड़ बहुत मजबूत है। ईरान के पास करीब 3000 शॉर्ट रेंज मिसाइलें हैं, जो 200 से 250 किलोमीटर तक मार कर सकती हैं। जंग के माहौल में सिर्फ हमले के डर से ही जहाजों का बीमा और माल भाड़ा काफी बढ़ जाता है। भले ही इसे पूरी तरह बंद करना ईरान के लिए भी नुकसानदेह हो, लेकिन जहाजों को दी जाने वाली चेतावनी ही तेल की कीमतों में आग लगाने के लिए काफी होती है।
यह पहली बार नहीं है जब होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दुनिया डरी हुई है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1980 से 1988 के बीच चले ईरान-इराक युद्ध के दौरान दोनों देशों ने एक-दूसरे की तेल सप्लाई रोकने के लिए कमर्शियल टैंकरों पर हमले किए थे, जिसे 'टैंकर युद्ध' कहा गया। 1988 में एक अमेरिकी लड़ाकू विमान ने गलती से ईरान के यात्री विमान को गिरा दिया था, जिसमें 290 लोग मारे गए थे। हालांकि अमेरिका ने इसे एक गलती करार दिया था। इसके बाद 2008, 2012 और 2018 में भी अमेरिका और ईरान के बीच इस रास्ते को लेकर कई बार तनातनी हुई है। जब भी अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए, ईरान ने इस रास्ते को बंद करने की धमकी देकर दुनिया को डराया है।
होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना या वहां तनाव बढ़ना भारत के लिए किसी झटके से कम नहीं है। भारत अपनी जरूरत का 90 पर्सेंट कच्चा तेल बाहर से मंगाता है। इसमें से करीब आधा हिस्सा यानी 50 पर्सेंट तेल इसी होर्मुज स्ट्रेट से होकर भारत आता है। अगर यहां रुकावट आती है, तो भारत को दूसरे देशों से महंगे दाम पर तेल खरीदना पड़ेगा। बड़ी मुश्किल यह भी है कि खाड़ी देशों से तेल भारत आने में सिर्फ 5 से 7 दिन लगते हैं, जबकि रूस या अमेरिका से तेल मंगाने में 25 से 45 दिन का समय लग जाता है। इसका सीधा असर आपकी जेब पर पड़ेगा और देश में पेट्रोल-डीजल के दाम के साथ महंगाई भी बढ़ जाएगी।
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