बिजनेस न्यूज़

4 min read | अपडेटेड March 02, 2026, 13:58 IST
सारांश
आज की स्थिति की जड़ ईरान बनाम अमेरिका-इज़राइल गठजोड़ के बढ़ते सैन्य तनाव में है। भले ही ईरान के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर कहा हो कि फिलहाल Strait of Hormuz बंद करने का इरादा नहीं है, लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि हमलों के बाद कई तेल टैंकर इस रास्ते से गुजरने से बच रहे हैं।

17–20 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरने का रास्ता
Strait of Hormuz: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जंग ने पूरी दुनिया के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी है। उनमें से एक खतरा Strait of Hormuz का बंद होने से जुड़ा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर यह लंबे समय तक बंद रहता है और दुनिया के पास मौजूद आपातकालीन तेल भंडार भी खत्म होने लगें, तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल सकती है। यह 33 किलोमीटर चौड़ा समुद्री रास्ता दुनिया के करीब 20% तेल और बड़ी मात्रा में गैस की सप्लाई का रास्ता है, इसलिए इसका बंद होना सीधे ऊर्जा, महंगाई और व्यापार पर चोट करेगा।
आज की स्थिति की जड़ ईरान बनाम अमेरिका-इज़राइल गठजोड़ के बढ़ते सैन्य तनाव में है। भले ही ईरान के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर कहा हो कि फिलहाल Strait of Hormuz बंद करने का इरादा नहीं है, लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि हमलों के बाद कई तेल टैंकर इस रास्ते से गुजरने से बच रहे हैं। यानी भले कागजों पर यह खुला हो, लेकिन जमीनी हकीकत में जोखिम बहुत बढ़ चुका है।
इस रास्ते से रोजाना करीब 17–20 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और कतर जैसे देशों का ज्यादातर तेल और गैस इसी रास्ते से दुनिया तक पहुंचता है। खास बात यह है कि कतर, जो दुनिया के बड़े LNG एक्सपोर्टर्स में से एक है, भारत और चीन जैसे देशों को गैस भेजने के लिए भी इसी पर निर्भर है। अगर यह रास्ता बंद होता है, तो तेल और गैस दोनों की सप्लाई एक साथ प्रभावित होगी।
भारत के लिए यह रास्ता बेहद संवेदनशील है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है और उसमें से करीब आधा मिडिल ईस्ट से आता है, जो Hormuz से होकर गुजरता है। लंबे समय तक सप्लाई रुकी तो पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, रुपये पर दबाव आएगा और महंगाई बढ़ेगी। ट्रांसपोर्ट, खाद, MSME, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर की लागत बढ़ेगी। भारत के Gulf देशों को होने वाले नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट्स भी महंगे और मुश्किल हो सकते हैं।
चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है, रोज करीब 1 करोड़ बैरल तेल मंगाता है, जिसमें से लगभग 40% Hormuz से आता है। भले ही चीन ने रूस और सेंट्रल एशिया से पाइपलाइन सप्लाई बनाई है, लेकिन वह उसकी कुल जरूरत का छोटा हिस्सा ही पूरा करती है। अगर Hormuz से सप्लाई रुकी, तो चीन का उद्योग, फैक्ट्रियां और एक्सपोर्ट बुरी तरह प्रभावित होंगे, और क्योंकि चीन दुनिया की सप्लाई चेन का केंद्र है, इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
जापान और दक्षिण कोरिया भी भारी जोखिम में हैं। जापान अपनी जरूरत का 70% से ज्यादा तेल आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है। ऊर्जा महंगी होने का मतलब है बिजली, फैक्ट्रियों और एक्सपोर्ट लागत में तेज बढ़ोतरी। वहीं यूएई जैसे तेल निर्यातक देशों के लिए भी दिक्कत है, क्योंकि रास्ता बंद होने पर उन्हें तेल दूसरे महंगे और लंबे रूट से भेजना पड़ेगा, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ेगी।
हालांकि फिलहाल स्थिति पूरी तरह तबाही जैसी नहीं दिखती, क्योंकि बड़े तेल आयातक देश International Energy Agency के सदस्य हैं। IEA के नियमों के तहत इन देशों को कम से कम 90 दिनों का आपातकालीन तेल भंडार रखना होता है। यही भंडार कुछ समय तक झटके को संभाल सकता है और बाजार को तुरंत क्रैश होने से बचाता है।
लेकिन असली खतरा तब होगा जब यह लंबे समय तक बंद रहा और ये भंडार भी तेजी से घटने लगें। तब तेल और गैस की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं, समुद्री भाड़े 30-40% तक बढ़ सकते हैं, महंगाई लौट सकती है और वैश्विक आर्थिक मंदी का खतरा पैदा हो सकता है।
संबंधित समाचार
इसको साइनअप करने का मतलब है कि आप Upstox की नियम और शर्तें मान रहे हैं।
लेखकों के बारे में

अगला लेख
इसको साइनअप करने का मतलब है कि आप Upstox की नियम और शर्तें मान रहे हैं।