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Dollar vs Rupee: कुछ ही दिनों में ₹91 से सीधे ₹92 तक लुढ़का रुपया, विदेशी निवेशकों की बिकवाली समेत ये हैं बड़ी वजहें

Upstox

3 min read | अपडेटेड January 29, 2026, 11:12 IST

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सारांश

रुपये की कमजोरी की मुख्य वजह विदेशी निवेशकों का लगातार पैसा निकालना और आगे और गिरावट के डर से कंपनियों और इंपोर्टर्स का डॉलर खरीदकर खुद को सुरक्षित करना है। यानी लोग पहले से ही डॉलर जमा कर रहे हैं ताकि बाद में रुपये के और कमजोर होने से नुकसान न हो। इसी वजह से बाजार में डॉलर की मांग बढ़ गई है और रुपया दबाव में आ गया है।

Rupee

पिछले कुछ ही कारोबारी सत्रों में रुपया पहली बार 91 के नीचे गया था और अब सीधे 92 के पास पहुंच गया है।

Rupee hits all-time low: आज 29 जनवरी को भारतीय रुपया अपने अब तक के नए निचले स्तर पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार में यह करीब 91.99 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर ट्रेड करता दिखा। यह पिछले हफ्ते बने रिकॉर्ड लो से भी नीचे है। इस साल अब तक रुपया लगभग 2% टूट चुका है और अगस्त में अमेरिका द्वारा भारत के निर्यात पर भारी टैरिफ लगाने के बाद से करीब 5% गिर चुका है। यहां हम समझेंगे कि रुपये के गिरने की वजह क्या है।
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विदेशी निवेशकों की बिकवाली

रुपये की कमजोरी की मुख्य वजह विदेशी निवेशकों का लगातार पैसा निकालना और आगे और गिरावट के डर से कंपनियों और इंपोर्टर्स का डॉलर खरीदकर खुद को सुरक्षित करना है। यानी लोग पहले से ही डॉलर जमा कर रहे हैं ताकि बाद में रुपये के और कमजोर होने से नुकसान न हो। इसी वजह से बाजार में डॉलर की मांग बढ़ गई है और रुपया दबाव में आ गया है।

क्या है एक्सपर्ट्स की राय

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक Goldman Sachs जैसे बड़े वैश्विक बैंक मानते हैं कि अमेरिका के ऊंचे टैरिफ फिलहाल भारत के विदेशी व्यापार पर बोझ बने रहेंगे, भले ही आगे चलकर ये कम हो जाएं। इसी कारण भारत के बाहरी खातों पर दबाव बना हुआ है। Goldman Sachs का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में रुपया 94 प्रति डॉलर तक भी जा सकता है।

ट्रेडर्स का कहना है कि गुरुवार सुबह बाजार खुलने से पहले RBI ने शायद हस्तक्षेप किया और डॉलर बेचकर रुपये को सहारा दिया, ताकि 92 का अहम स्तर टूटने से रोका जा सके। हालांकि RBI बार-बार कहता है कि वह किसी तय लेवल को बचाने की कोशिश नहीं करता, बल्कि सिर्फ बहुत तेज उतार-चढ़ाव को काबू में रखने के लिए बीच में आता है।

कुछ ही दिनों में 91 से 92 पर पहुंचा रुपया

पिछले कुछ ही कारोबारी सत्रों में रुपया पहली बार 91 के नीचे गया था और अब सीधे 92 के पास पहुंच गया है। अमेरिका के टैरिफ, भारी विदेशी पूंजी निकासी, सोने के ज्यादा आयात और कंपनियों की चिंता के चलते की जा रही हेजिंग, इन सबने मिलकर रुपये पर लगातार दबाव बनाए रखा है, जबकि भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है और हाल ही में उसने यूरोपीय यूनियन के साथ फ्री ट्रेड डील भी की है।

अमेरिका की तरफ देखें तो फेड चेयर जेरोम पॉवेल ने अभी ब्याज दर घटाने का कोई साफ संकेत नहीं दिया है। बड़े बैंक जैसे Morgan Stanley का मानना है कि अगर सब ठीक रहा तो 2026 के बीच, यानी जून या सितंबर के आसपास ही रेट कट संभव है। तब तक डॉलर मजबूत बना रह सकता है और एशियाई करेंसी, जिसमें रुपया भी शामिल है, दबाव में रह सकती हैं।

क्या होता है कमजोर रुपये का असर?

कमजोर रुपये का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इससे तेल, गैस और दूसरी आयात वाली चीजें महंगी हो जाती हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। हालांकि निर्यात करने वाली कंपनियों को थोड़ा फायदा मिल सकता है, क्योंकि उनका सामान विदेशों में सस्ता पड़ता है। लेकिन आम आदमी के लिए इसका मतलब अक्सर महंगी चीजें होता है।

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लेखकों के बारे में

Upstox
Upstox Hindi News Desk पत्रकारों की एक टीम है जो शेयर बाजारों, अर्थव्यवस्था, वस्तुओं, नवीनतम व्यावसायिक रुझानों और व्यक्तिगत वित्त को उत्साहपूर्वक कवर करती है।

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