बिजनेस न्यूज़
.png)
4 min read | अपडेटेड March 24, 2026, 15:03 IST
सारांश
देश का हवाई सफर जितना ग्लैमरस दिखता है, बिजनेस के लिहाज से उतना ही रिस्की है। 2016 के बाद से किंगफिशर जैसी कई बड़ी एयरलाइंस ने दम तोड़ दिया है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने बताया कि एयरलाइंस पर करोड़ों का बकाया है। अब इंडस्ट्री में बड़े बदलाव और मर्जर का दौर चल रहा है।

भारतीय आसमान से गायब हुईं 11 एयरलाइंस, कर्ज और घाटे ने डुबोई लुटिया।
भारत का एविएशन सेक्टर बाहर से देखने में जितना चमक-धमक वाला और तेजी से बढ़ता हुआ दिखता है, हकीकत में इसके अंदर की राह उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। हाल ही में सरकार ने संसद में जो आंकड़े पेश किए हैं, वे इस सेक्टर की एक अलग ही तस्वीर दिखाते हैं। साल 2016 के बाद से अब तक देश में 11 एयरलाइंस अपना काम बंद कर चुकी हैं। यह आंकड़ा इस बात का सबूत है कि आसमान में उड़ान भरने के मौके तो बहुत हैं, लेकिन इसके साथ जुड़ा जोखिम भी बहुत बड़ा है।
यह महत्वपूर्ण जानकारी नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में दी है। टीएमसी सांसद साकेत गोखले ने एयरलाइंस के बंद होने और उन पर बकाया कर्ज को लेकर सवाल पूछा था। सरकार ने अपने जवाब में साफ किया कि एयरलाइंस के बंद होने के पीछे कई बड़े कारण रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी वजह भारी वित्तीय दबाव यानी फाइनेंशियल प्रेशर रहा है। इसके अलावा विमानों की कमी और कंपनियों के अंदरूनी मैनेजमेंट से जुड़ी समस्याओं ने भी इन एयरलाइंस की कमर तोड़ दी है।
एविएशन सेक्टर में बिजनेस करना कोई आसान काम नहीं है क्योंकि यहां लागत बहुत ज्यादा होती है। कंपनियों को ईंधन की बढ़ती कीमतों, लीज पर लिए गए एयरक्राफ्ट के भारी भरकम खर्च, एयरपोर्ट चार्ज और मेंटेनेंस जैसे खर्चों से जूझना पड़ता है। अगर किसी कंपनी के पास पैसों का फ्लो सही नहीं है या उसके मैनेजमेंट में जरा सी भी गड़बड़ी होती है, तो उसके लिए मार्केट में टिके रहना मुश्किल हो जाता है। सरकार ने यह भी साफ किया कि एयरलाइंस एक ऐसी व्यवस्था में काम करती हैं जहां वे अपने बिजनेस से जुड़े फैसले खुद लेती हैं, इसलिए सरकार उनके रोजाना के ऑपरेशन या फाइनेंशियल मामलों में सीधा दखल नहीं देती है।
भले ही एयरलाइंस बंद हो रही हैं, लेकिन सरकार इस सेक्टर को मजबूत करने के लिए लगातार काम कर रही है। सरकार का कहना है कि वह पॉलिसी के लेवल पर कई सुधार कर रही है ताकि बिजनेस करना आसान हो सके। इसमें एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़ा करना और ट्रैफिक राइट्स को सरल बनाना शामिल है। इसके अलावा सरकार उड़ान स्कीम के जरिए छोटे शहरों को हवाई नेटवर्क से जोड़ने पर फोकस कर रही है। इससे न केवल हवाई सफर की डिमांड बढ़ेगी, बल्कि एयरलाइंस को नए रूट्स पर काम करने का मौका भी मिलेगा। ई-गवर्नेंस और आसान प्रक्रियाओं के जरिए भी बिजनेस को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।
मौजूदा समय में एविएशन इंडस्ट्री के अंदर कई बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं। अब कंपनियां अकेले चलने के बजाय आपस में जुड़ रही हैं। उदाहरण के तौर पर एयरएशिया इंडिया अब एआईएक्स कनेक्ट बन चुकी है और इसका विलय एयर इंडिया एक्सप्रेस में हो चुका है। इसी तरह विस्तारा का भी एयर इंडिया में मर्जर कर दिया गया है। यह दिखाता है कि अब इंडस्ट्री कंसोलिडेशन की तरफ बढ़ रही है ताकि बड़ी कंपनियां मिलकर मार्केट में मजबूती से खड़ी रह सकें।
बंद हो चुकी एयरलाइंस पर एयरपोर्ट अथॉरिटी का भारी बकाया भी एक बड़ी समस्या है। आंकड़ों के मुताबिक किंगफिशर एयरलाइंस पर सबसे ज्यादा करीब 380.51 करोड़ रुपये का बकाया है। इसमें मूल राशि के साथ-साथ ब्याज भी जुड़ा हुआ है। यह पूरा मामला अभी कानूनी प्रक्रिया के अधीन है। दूसरी तरफ ट्रूजेट जैसी छोटी कंपनी पर महज 0.03 करोड़ रुपये का ही बकाया है। एक राहत की बात यह है कि जेट एयरवेज और गो फर्स्ट जैसी कंपनियों पर एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया का कोई पैसा बकाया नहीं है।
संबंधित समाचार
लेखकों के बारे में
.png)
अगला लेख