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Budget 2026: क्या होता है थॉलिनॉमिक्स? जिसकी मदद से लगाया जाता है महंगाई का अंदाजा

विकास तिवारी

4 min read | अपडेटेड January 13, 2026, 14:39 IST

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सारांश

थॉलिनॉमिक्स वह तरीका है जिससे भारत सरकार आम आदमी की भोजन की थाली की लागत के आधार पर देश की आर्थिक सेहत का पता लगाती है। इसे पहली बार 2019-20 के आर्थिक सर्वेक्षण में पेश किया गया था। यह बताता है कि एक मजदूर अपनी कमाई का कितना हिस्सा भोजन पर खर्च करता है।

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थॉलिनॉमिक्स के जरिए महंगाई का अंदाजा लगाया जाता है।

जैसे-जैसे फरवरी का महीना करीब आ रहा है, देश भर में बजट 2026 को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हर बार की तरह इस बार भी आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता महंगाई और उसकी रसोई का खर्च है। इसी कड़ी में एक शब्द बार-बार सुनने को मिलता है और वह है 'थॉलिनॉमिक्स'। सरल शब्दों में कहें तो थॉलिनॉमिक्स भोजन की एक थाली का अर्थशास्त्र है। यह हमें बताती है कि देश में एक सामान्य व्यक्ति के लिए पेट भर भोजन करना कितना सस्ता या महंगा हुआ है। बजट के दौरान वित्त मंत्रालय इस आंकड़ों का इस्तेमाल यह समझने के लिए करता है कि सरकारी नीतियों का जमीनी स्तर पर जनता पर क्या असर पड़ रहा है।

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थॉलिनॉमिक्स का क्या है मतलब?

थॉलिनॉमिक्स शब्द का पहली बार इस्तेमाल भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में किया गया था। उस समय सरकार ने यह तर्क दिया था कि अर्थशास्त्र को केवल जटिल आंकड़ों और चार्ट के जरिए नहीं समझा जा सकता, बल्कि इसे आम आदमी के दैनिक जीवन से जोड़ना जरूरी है। थॉलिनॉमिक्स के जरिए यह देखा जाता है कि एक औद्योगिक मजदूर या सामान्य नागरिक अपनी दैनिक मजदूरी का कितना प्रतिशत हिस्सा केवल भोजन पर खर्च कर देता है। अगर थाली की कीमत कम होती है, तो इसका मतलब है कि आम आदमी की बचत बढ़ रही है और उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है। इसके उलट अगर थाली महंगी होती है, तो यह महंगाई का बड़ा संकेत होता है।

थाली की कीमत निकालने का क्या है तरीका

थॉलिनॉमिक्स की गणना करने के लिए सरकार दो तरह की थालियों का सहारा लेती है, एक शाकाहारी और दूसरी मांसाहारी। शाकाहारी थाली में अनाज के साथ दाल और सब्जी को शामिल किया जाता है, जबकि मांसाहारी थाली में दाल की जगह मांस या अंडे को जगह दी जाती है। इसमें मसालों, तेल और ईंधन की कीमतों को भी जोड़ा जाता है। सरकार देश के अलग-अलग हिस्सों से इन चीजों की कीमतों के आंकड़े इकट्ठा करती है। इसके बाद यह देखा जाता है कि एक सामान्य परिवार, जिसमें पांच सदस्य हों और वे दिन में दो बार थाली का सेवन करते हों, उनका सालाना खर्च कितना बैठ रहा है। यह तरीका महंगाई को समझने का एक बहुत ही व्यावहारिक और आसान जरिया बन गया है।

आमतौर पर महंगाई को मापने के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन थॉलिनॉमिक्स इसे और ज्यादा स्पष्ट बना देता है। उदाहरण के तौर पर अगर दाल और सब्जियों के दाम बढ़ रहे हैं, तो थॉलिनॉमिक्स के जरिए तुरंत पता चल जाता है कि एक गरीब आदमी की थाली से कितनी चीजें कम हो सकती हैं। यह अवधारणा यह भी बताती है कि क्या सरकार की योजनाएं जैसे पीएम-किसान या राशन योजना सही मायने में लोगों का खर्च कम कर पा रही हैं या नहीं। बजट 2026 में भी सरकार इन्हीं आंकड़ों के आधार पर यह तय करेगी कि खाद्य सब्सिडी को कितना बढ़ाना है और कृषि क्षेत्र में किन सुधारों की जरूरत है।

बजट 2026 में थॉलिनॉमिक्स का रहेगा अहम रोल

इस साल के बजट में थॉलिनॉमिक्स की भूमिका काफी अहम होने वाली है क्योंकि वैश्विक अनिश्चितता और सप्लाई चेन में आने वाली दिक्कतों की वजह से खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि 'विकसित भारत' के सपने को पूरा करने के लिए सबसे पहले आम आदमी की थाली को सुरक्षित और सस्ता बनाया जाए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जब बजट पेश करेंगी, तो उनका ध्यान इस बात पर होगा कि कैसे मध्यम वर्ग और गरीबों की क्रय शक्ति बढ़ाई जाए। थॉलिनॉमिक्स के आंकड़े ही यह तय करेंगे कि आने वाले साल में आपको अपनी रसोई के बजट में राहत मिलेगी या फिर सावधानी बरतनी होगी।

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लेखकों के बारे में

विकास तिवारी
Vikash Tiwary is a finance journalist with 6+ years of newsroom experience. He is currently growing Upstox Hindi, crafting data-driven stories on stocks, personal finance, mutual funds, and global markets, while exploring how AI can simplify finance. His work spans Zee Business, TV9 Bharatvarsh, ABP News, India TV, and Inshorts. He also holds NISM certification.

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