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4 min read | अपडेटेड February 23, 2026, 09:40 IST
सारांश
संभावनाओ के पैमाने पर प्रकाश डालते हुए डॉ. जीतेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के लगभग 14 करोड़ खेती इकाइयां, जिनमें अधिकांश छोटे और सीमांत किसान हैं, एक साथ वार्षिक लगभग 70,000 करोड़ रुपये का मूल्य उत्पन्न कर सकती हैं।

Agri-AI से किसानों को होगा कितना फायदा?
देश की अगली एग्रीकल्चरल क्रांति आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से संचालित होगी, ऐसा मानना है विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ जीतेंद्र सिंह का, जिन्होंने 22 फरवरी को मुंबई में आयोजित AI4Agri 2026 शिखर सम्मेलन में यह बात कही। उन्होंने एआई (AI) को खेती नीति (Farm Policy), अनुसंधान और निवेश ढांचे का केंद्रीय स्तंभ बताया। ‘ग्लोबल कॉन्फ्रेंस ऑन AI इन एग्रीकल्चर एंड इन्वेस्टर समिट 2026’ के उद्घाटन सेशन को संबोधित करते हुए मंत्री ने कहा कि AI उन संरचनात्मक चुनौतियों के लिए पहली बार बड़े पैमाने पर लागू होने वाले समाधान पेश करता है, जो लंबे समय से खेती उत्पादकता को सीमित कर रही हैं, जैसे कि अनियमित मौसम, जानकारी की असमानता और टुकड़े‑टुकड़े मार्केट। उन्होंने कहा, ‘AI जो पेश करता है वह कोई नया डायग्नोसिस नहीं है, यह एक ऐसा ट्रीटमेंट है जिसे पूरे देश में बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है।’
उन्होंने यह भी नोट किया कि वैश्विक दक्षिण के लगभग 60 करोड़ किसानों के लिए भी अगर उत्पादकता में केवल 10% की वृद्धि हो जाए, तो यह उनके अनुसार इस सदी का सबसे बड़ा गरीबी‑निवारण अवसर होगा। एग्रीकल्चर को एक पुराने, परंपरागत सेक्टर के बजाय एक रणनीतिक सेक्टर के रूप में पेश करते हुए जीतेंद्र सिंह ने इस AI‑प्रयास को 10,372 करोड़ रुपये के इंडिया AI मिशन से जोड़ा, जो स्वदेशी सुपरकंप्यूटिंग क्षमता, डेटासेट और स्टार्टअप ढांचे का बड़े पैमाने पर निर्माण कर रहा है।
उन्होंने भारतजन (BharatGen) – भारत के सरकार‑स्वामित्व वाले बड़े भाषा‑मॉडल इकोसिस्टम – की चर्चा की, जिसने पहले ही ‘Agri Param’ नामक एक क्षेत्र‑विशिष्ट कृषि मॉडल जारी किया है जो 22 भारतीय भाषाओं में काम करता है और किसानों को अपनी मातृभाषा में सलाह‑सहायता तक पहुंच देता है। उन्होंने कहा, ‘यह वह AI है जो किसान से मराठी, भोजपुरी या कन्नड़ में बात करता है,’ और भाषाई समावेशन के महत्व पर जोर दिया। मंत्री ने बताया कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) इंडिया AI ओपन स्टैक को समर्थन दे रहा है, जो एक खुला, अंतरसंचालित (interoperable) ढांचा है, ताकि देश के किसी भी हिस्से में विकसित किए गए Agri‑AI समाधान राष्ट्रीय फ्रेमवर्क में आसानी से जुड़ सकें।
अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (Anusandhan NRF) IITs, IISc और ICAR के साथ मिलकर डीप‑टेक और AI अनुसंधान को फंड कर रहा है, जिसमें कृषि अनुप्रयोग भी शामिल हैं। जीतेंद्र सिंह ने ड्रोन और उपग्रह‑आधारित मैपिंग की ओर इशारा किया, जो पहले से ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड और स्वामित्व मिशन को मजबूत कर रही हैं, क्योंकि वे भूमि और मिट्टी के सत्यापित डेटा प्रदान करती हैं। उन्होंने जलवायु बुद्धिमत्ता (climate intelligence) में निवेश की बात की, जहां पृथ्वी विज्ञान और AI को प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में एकीकृत किया जा रहा है, ताकि किसान ‘घबराएं नहीं, बल्कि योजना बनाएं।’ उन्होंने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी (biotechnology) की भूमिका टिकाऊ और रोग‑प्रतिरोधी फसलों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण होगी, जिसमें कीट और पौधों के रोगों का शुरुआती, लक्षण‑रहित पता लगाना भी शामिल है, साथ ही एक चक्रीय फसल अर्थव्यवस्था (circular crop economy) को आगे बढ़ाने में भी यह महत्वपूर्ण योगदान देगी।
संभावनाओं के पैमाने पर प्रकाश डालते हुए डॉ. जीतेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के लगभग 14 करोड़ खेती इकाइयां, जिनमें अधिकांश छोटे और सीमांत किसान हैं, एक साथ वार्षिक लगभग 70,000 करोड़ रुपये का मूल्य उत्पन्न कर सकती हैं, अगर AI‑संचालित सलाह प्रत्येक किसान को बेहतर निवेश‑समय, कीट‑भविष्यवाणी और मार्केट‑लिंकेज के जरिए प्रति वर्ष केवल 5,000 रुपये भी बचा दे। उन्होंने महाराष्ट्र की 500 करोड़ रुपये की MahaAgri‑AI नीति 2025–29 को एक आदर्श मॉडल के रूप में उद्धृत किया और कहा कि केंद्र ऐसी राज्य‑स्तरीय पहलों को समन्वित और बढ़ावा देगा। उन्होंने बताया कि केंद्रीय बजट 2026–27 में ‘Bharat‑VISTAAR’ नामक एक बहुभाषी AI उपकरण का प्रस्ताव रखा गया है, जो AgriStack पोर्टल और ICAR के कृषि‑प्रथा पैकेज को AI प्रणालियों के साथ एकीकृत करके अनुकूलित सलाह‑सहायता प्रदान करेगा और खेती‑जोखिम को कम करेगा। उनका जोर छोटे, उद्देश्य‑विशिष्ट AI मॉडलों पर है, जो भारतीय मिट्टी के प्रकारों, जलवायु क्षेत्रों और फसल‑किस्मों पर प्रशिक्षित हों और मोबाइल फोनों और खेती उपकरणों के माध्यम से कम‑कनेक्टिविटी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में भी तैनात किए जा सकें।एक संघीय राष्ट्रीय ढांचे की आवश्यकता पर जोर देते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि कृषि‑डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे MahaAgriX को एक राष्ट्रीय Agri Data Commons में विकसित होना चाहिए।
उन्होंने हितधारकों से एक प्रस्तावित राष्ट्रीय Agri‑AI अनुसंधान नेटवर्क में योगदान करने का आह्वान किया, जो DST, राज्य सरकारों, ICRISAT, ICAR और वैश्विक संस्थानों के बीच सहयोग पर आधारित होगा और फसलों, मिट्टी और जलवायु के लिए भारत‑विशिष्ट आधारभूत डेटासेट विकसित करेगा। किसान को AI बस इसलिए नहीं चाहिए कि वह हो; उसे उपयोगी होना चाहिए। यही हमारी दिशा‑सूचक होनी चाहिए,’ उन्होंने कहा और सहयोगात्मक वितरण के आह्वान के साथ यह पुनरावृत्त किया कि भारत वैश्विक कृषि‑AI ढांचों में एक प्राप्तकर्ता (recipient) के बजाय एक सह‑वास्तुकार (co‑architect) के रूप में कार्य करने का इरादा रखता है।
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