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4 min read | अपडेटेड March 18, 2026, 12:14 IST
सारांश
इनकम टैक्स बचाने के लिए आज भी बहुत से लोग पुराने टैक्स सिस्टम को पसंद कर रहे हैं। अगर आप होम लोन, इंश्योरेंस और पीपीएफ जैसी स्कीमों में इन्वेस्टमेंट करते हैं, तो पुराना रेजीम आपके लिए ज्यादा बेहतर है। इसमें मिलने वाले डिडक्शन आपकी टैक्सेबल इनकम को कम करके टैक्स का बोझ घटा देते हैं।

भारत में टैक्सपेयर्स के पास दो विकल्प मौजूद हैं।
जब भारत सरकार ने नया टैक्स सिस्टम लागू किया, तब टैक्सपेयर्स को दो ऑप्शन दिए गए। पहला पुराना टैक्स रेजीम है, जिसमें कई तरह की छूट और डिडक्शन मिलते हैं। दूसरा नया टैक्स रेजीम है, जिसमें टैक्स दरें तो कम रखी गई हैं लेकिन ज्यादातर छूट और लाभ खत्म कर दिए गए हैं। हालांकि नया टैक्स सिस्टम प्रोसेस को आसान बनाने के लिए लाया गया है, लेकिन यह हर इंसान के लिए फायदेमंद नहीं होता है। खासकर उन लोगों के लिए जो इनकम टैक्स कानून की अलग-अलग धाराओं के तहत नियमित रूप से टैक्स छूट का लाभ लेते हैं। तो आइए जानते हैं चार ऐसी वजहें, जिनके कारण कई लोगों के लिए पुराना टैक्स रेजीम अभी भी बेहतर विकल्प हो सकता है।
पुराने टैक्स रेजीम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कई तरह की टैक्स छूट और डिडक्शन मिलते हैं। अगर आप इनकम टैक्स कानून की धारा 80सी के तहत इन्वेस्टमेंट करते हैं, जैसे ईपीएफ, पीपीएफ, जीवन बीमा प्रीमियम, होम लोन की मूल राशि का भुगतान या ईएलएसएस म्यूचुअल फंड, तो आपको इसमें 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट मिल सकती है। इसके अलावा धारा 80डी के तहत हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम पर भी अलग से लाभ मिलता है। अगर आप पहले से इन सभी स्कीमों में पैसा लगा रहे हैं और इनका पूरा यूज करेंगे, तो नए टैक्स रेजीम में जाने से आपकी टैक्स बचत काफी कम हो सकती है। वहां ये डिडक्शन उपलब्ध नहीं हैं, जिससे आपकी टैक्सेबल इनकम बढ़ जाती है।
अगर आपने अपना घर बनाने के लिए होम लोन लिया हुआ है या आप नौकरी के कारण किसी दूसरे शहर में किराए के घर में रहते हैं, तो पुराना टैक्स सिस्टम आपके लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। होम लोन लेने वाले लोग धारा 24बी के तहत लोन के ब्याज पर 2 लाख रुपये तक की टैक्स छूट ले सकते हैं। इसके अलावा होम लोन की मूल राशि यानी प्रिंसिपल अमाउंट पर धारा 80सी के तहत भी छूट मिल जाती है। वहीं किराए के घर में रहने वाले सैलरीड कर्मचारी एचआरए यानी हाउस रेंट अलाउंस के जरिए टैक्स बचा सकते हैं। नए टैक्स सिस्टम में ये बड़े फायदे मौजूद नहीं हैं, इसलिए कई कर्मचारियों के लिए पुराना रेजीम ही बेहतर चुनाव है।
ज्यादातर सैलरीड कर्मचारियों को कंपनी की तरफ से एचआरए, एलटीए यानी लीव ट्रैवल अलाउंस, कन्वेंस अलाउंस या प्रोफेशनल टैक्स जैसी सुविधाएं और भत्ते मिलते हैं। पुराने टैक्स सिस्टम में इन भत्तों पर आंशिक या पूरी टैक्स छूट मिल सकती है, जिससे आपकी नेट टैक्सेबल इनकम कम हो जाती है। नए टैक्स रेजीम में इन भत्तों की छूट नहीं मिलती है, जिससे कई मामलों में टैक्स का बोझ बढ़ सकता है। सैलरी स्ट्रक्चर अगर ऐसा है जिसमें अलाउंस का हिस्सा ज्यादा है, तो पुराना सिस्टम ही टैक्स बचाने में मदद करता है। वहां कैलकुलेशन के बाद अक्सर टैक्स देनदारी कम निकलती है।
पुराना टैक्स रेजीम टैक्स प्लानिंग के लिए ज्यादा विकल्प देता है। इसमें आप सही इन्वेस्टमेंट और योजनाबद्ध तरीके से टैक्स कम कर सकते हैं। पीपीएफ, ईएलएसएस और एनपीएस जैसे इन्वेस्टमेंट विकल्प न सिर्फ आज आपका टैक्स बचाते हैं, बल्कि लंबी अवधि में बेहतर फाइनेंशियल प्लानिंग बनाने में भी मदद करते हैं। जो लोग अपने इन्वेस्टमेंट और टैक्स प्लानिंग पर पूरा कंट्रोल रखना चाहते हैं, उनके लिए पुराना टैक्स सिस्टम ज्यादा उपयुक्त हो सकता है। नया टैक्स रेजीम भले ही आसान है और इसमें कागजी कार्रवाई कम है, लेकिन इसमें टैक्स बचत के ऑप्शन बहुत सीमित हैं। इसलिए निवेश की आदत रखने वालों के लिए ओल्ड रेजीम ही सबसे मजबूत विकल्प बना हुआ है।
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