पर्सनल फाइनेंस
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3 min read | अपडेटेड March 25, 2026, 16:48 IST
सारांश
अगर कोई कंपनी दिवालिया हो जाती है, तो कर्मचारियों को अपनी ग्रेच्युटी खोने का डर सताने लगता है। हालांकि, भारतीय कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के मुताबिक, ग्रेच्युटी का पैसा कंपनी की संपत्ति नहीं माना जाता। इसे कर्मचारियों का हक मानकर लिक्विडेशन प्रक्रिया में सबसे पहले चुकाया जाना जरूरी है।

दिवालिया हुई कंपनी तो Gratuity के पैसे का क्या होगा?
जब कोई बड़ी कंपनी आर्थिक संकट में फंसकर दिवालिया हो जाती है, तो उसके ऑपरेशन बंद होने लगते हैं और कर्मचारियों की छंटनी शुरू हो जाती है। ऐसे समय में कर्मचारियों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि सालों तक की गई मेहनत के बदले मिलने वाली ग्रेच्युटी का क्या होगा। क्या कंपनी के पास पैसा न होने पर यह रकम डूब जाएगी। आपको बता दे कि भारतीय कानून में कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए बहुत मजबूत इंतजाम किए गए हैं। देश का कानून यह साफ कहता है कि कंपनी भले ही कंगाल हो जाए, लेकिन वह अपने कर्मचारियों की ग्रेच्युटी का पैसा नहीं मार सकती।
पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट 1972 के तहत, अगर किसी कर्मचारी ने किसी संस्थान में लगातार 5 साल या उससे ज्यादा समय तक काम किया है, तो वह ग्रेच्युटी पाने का हकदार होता है। जब कोई कंपनी दिवालिया घोषित की जाती है, तो उसकी पूरी प्रक्रिया इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत चलती है। कानून की नजर में ग्रेच्युटी और प्रोविडेंट फंड (PF) का पैसा कंपनी की अपनी संपत्ति नहीं होती। इसे एक 'ट्रस्ट' की अमानत माना जाता है, जो केवल कर्मचारियों के लिए रखी गई है। इसका मतलब यह है कि अगर कंपनी पर बहुत ज्यादा कर्ज है, तब भी वह लेनदारों का पैसा चुकाने के लिए ग्रेच्युटी के फंड का इस्तेमाल नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में यह साफ कर दिया है कि लिक्विडेशन यानी कंपनी की संपत्ति बेचकर पैसा वसूलने की प्रक्रिया में ग्रेच्युटी और पीएफ को प्राथमिकता दी जाएगी। जब किसी कंपनी को बेचा जाता है या उसकी मशीनें और जमीन नीलाम होती है, तो उससे जो रेवेन्यू मिलता है, उसका इस्तेमाल सबसे पहले कर्मचारियों के बकाया चुकाने में किया जाना चाहिए। बैंक या दूसरे बड़े सुरक्षित लेनदार (Secured Creditors) अपना हिस्सा बाद में पाते हैं। अदालत का मानना है कि कर्मचारियों का पसीना और उनकी मेहनत का पैसा किसी भी कमर्शियल लोन से ऊपर है। इसलिए कंपनी के डूबने की स्थिति में भी कर्मचारियों को ग्रेच्युटी मिलने की पूरी उम्मीद रहती है।
अगर आपकी कंपनी दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही है, तो आपको चुपचाप बैठकर इंतजार नहीं करना चाहिए। जैसे ही कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू होती है, एक प्रोफेशनल नियुक्त किया जाता है जिसे लिक्विडेटर या रेजोल्यूशन प्रोफेशनल कहा जाता है। कर्मचारियों को अपने बकाया पैसों और ग्रेच्युटी के लिए एक निर्धारित फॉर्म भरकर अपना दावा पेश करना पड़ता है। इस फॉर्म के साथ आपको अपने काम करने के सबूत और सैलरी स्लिप जैसे डॉक्यूमेंट लगाने होते हैं। एक बार जब लिक्विडेटर आपके दावे की पुष्टि कर देता है, तो संपत्ति बेचने से मिलने वाली रकम में से आपका हिस्सा तय कर दिया जाता है।
कर्मचारियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि ग्रेच्युटी का हक तभी बनता है जब उन्होंने कंपनी में कम से कम पांच साल पूरे किए हों। हालांकि, कंपनी के बंद होने या दिवालिया होने की स्थिति में कुछ खास नियमों के तहत इस समय सीमा में थोड़ी राहत भी मिल सकती है। हर कंपनी के लिए यह जरूरी है कि वह ग्रेच्युटी का एक अलग फंड बनाकर रखे और उसका इंश्योरेंस कराए। अगर कंपनी ने ऐसा नहीं किया है, तो भी दिवालिया होने पर उसकी अन्य संपत्तियों को बेचकर इस देनदारी को पूरा किया जाता है।
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