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No Cost EMI vs Full Payment: शॉपिंग करने से पहले समझिए बचत के तराजू पर कौन है फायदेमंद?

Upstox

4 min read | अपडेटेड February 10, 2026, 14:59 IST

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सारांश

आज के समय में शॉपिंग के दौरान नो कॉस्ट ईएमआई और फुल पेमेंट दो बड़े विकल्प होते हैं। लोग अक्सर बिना ब्याज वाली किस्तों की ओर खिंचे चले जाते हैं, लेकिन क्या यह वाकई सस्ता है? इस लेख में जानिए कि आपकी जेब के लिए कौन सा तरीका बेहतर है और इसमें छिपे हुए खर्चे क्या हैं।

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No Cost EMI vs Full Payment में कौन बेहतर?

आजकल जब भी हम ऑनलाइन या ऑफलाइन शॉपिंग करने जाते हैं, तो हमारे सामने भुगतान के कई तरीके होते हैं। इनमें से सबसे ज्यादा लुभावना विकल्प 'नो कॉस्ट ईएमआई' लगता है। विज्ञापनों में इसे ऐसे पेश किया जाता है जैसे आपको बिना किसी अतिरिक्त पैसे के सामान किस्तों में मिल रहा है। दूसरी तरफ फुल पेमेंट यानी एक बार में पूरा पैसा चुकाने का पुराना तरीका है। बहुत से लोग इस उलझन में रहते हैं कि आखिर कौन सा विकल्प उनकी जेब के लिए सबसे सही है। अगर आप भी नया फोन, लैपटॉप या फ्रिज खरीदने की सोच रहे हैं, तो रुकिए और समझिए कि बचत के तराजू पर कौन सा पलड़ा भारी है।

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नो कॉस्ट ईएमआई का असली सच

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि शॉपिंग करते वक्त कुछ भी पूरी तरह 'मुफ्त' नहीं होता। बैंक और कंपनियां जब आपको नो कॉस्ट ईएमआई का विकल्प देती हैं, तो उसके पीछे एक गणित काम करता है। असल में बैंक आपसे ब्याज तो लेता ही है, लेकिन वह ब्याज आपको सामान की कीमत में छूट के तौर पर पहले ही घटा दिया जाता है। उदाहरण के लिए, अगर कोई सामान 30,000 रुपये का है और उस पर 3,000 रुपये का ब्याज बनना है, तो कंपनी आपको वह सामान 27,000 रुपये में देगी और बाकी के 3,000 रुपये बैंक ब्याज के रूप में वसूलेगा। आपको लगेगा कि आप केवल 30,000 रुपये ही दे रहे हैं, लेकिन यहां एक छिपा हुआ खर्चा भी है।

जीएसटी और प्रोसेसिंग फीस का खेल

नो कॉस्ट ईएमआई चुनते समय जो सबसे बड़ी बात लोग भूल जाते हैं, वह है बैंक द्वारा लिया जाने वाला जीएसटी और प्रोसेसिंग फीस। भले ही कंपनी आपसे ब्याज न ले रही हो, लेकिन बैंक उस ब्याज वाली राशि पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी वसूलता है। इसके अलावा कई बैंक 99 रुपये से लेकर 299 रुपये तक की प्रोसेसिंग फीस भी काटते हैं। यह थोड़ा ऊपर नीचे भी हो सकता है। हालांकि यहां हैरानी की बात ये है कि यह सारा पैसा आपकी जेब से ही जाता है। अगर आप इन छोटे-छोटे खर्चों को जोड़ेंगे, तो आपको पता चलेगा कि सामान अपनी असली कीमत से थोड़ा महंगा ही पड़ा है।

फुल पेमेंट के अपने फायदे

वहीं दूसरी ओर अगर आप फुल पेमेंट यानी एक बार में सारा पैसा चुकाते हैं, तो इसके अपने अलग फायदे हैं। कई बार कंपनियां उन ग्राहकों को अतिरिक्त कैश डिस्काउंट या बैंक ऑफर देती हैं जो तुरंत पूरा भुगतान करते हैं। फुल पेमेंट करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपके सिर पर कोई कर्ज नहीं रहता। आपको हर महीने किस्त कटने की चिंता नहीं सताती। इसके अलावा आप उन अतिरिक्त खर्चों से भी बच जाते हैं जो EMI के साथ जुड़े होते हैं। अगर आपके पास पर्याप्त पैसा है और वह आपकी जरूरी बचत का हिस्सा नहीं है, तो फुल पेमेंट करना हमेशा एक समझदारी भरा फैसला माना जाता है।

कब कौन सा विकल्प चुनना है सही?

सही चुनाव आपकी वर्तमान आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। अगर आप कोई बहुत महंगा सामान खरीद रहे हैं और एक साथ सारा पैसा देने से आपका बजट बिगड़ सकता है, तो नो कॉस्ट ईएमआई एक अच्छा विकल्प हो सकता है। यह आपको अपनी नकदी बचाने में मदद करता है जिसे आप किसी इमरजेंसी के लिए रख सकते हैं। लेकिन अगर सामान की कीमत कम है और आप आसानी से भुगतान कर सकते हैं, तो फुल पेमेंट ही बेहतर है। हमेशा याद रखें कि क्रेडिट कार्ड पर बहुत ज्यादा ईएमआई होने से आपका क्रेडिट स्कोर भी प्रभावित हो सकता है। या कभी आप बिल को तय समय में जमा नहीं कर पाते।

खरीदारी से पहले सावधानी है जरूरी

शॉपिंग शुरू करने से पहले आपको हमेशा नियम और शर्तों को ध्यान से पढ़ना चाहिए। बैंक की वेबसाइट पर जाकर देखें कि नो कॉस्ट ईएमआई पर कितनी प्रोसेसिंग फीस लग रही है। अगर किसी सामान पर फुल पेमेंट करने पर भारी डिस्काउंट मिल रहा है, तो ईएमआई के चक्कर में न पड़ें। स्मार्ट खरीदार वही है जो केवल विज्ञापनों के पीछे न भागे बल्कि अपनी डायरी और कैलकुलेटर लेकर हिसाब लगाए। थोड़ी सी सतर्कता और सही जानकारी आपको हजारों रुपये की चपत लगने से बचा सकती है।

लेखकों के बारे में

Upstox
Upstox Hindi News Desk पत्रकारों की एक टीम है जो शेयर बाजारों, अर्थव्यवस्था, वस्तुओं, नवीनतम व्यावसायिक रुझानों और व्यक्तिगत वित्त को उत्साहपूर्वक कवर करती है।

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