पर्सनल फाइनेंस
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3 min read | अपडेटेड November 25, 2025, 16:08 IST
सारांश
नए लेबर कोड लागू होने के साथ ही केंद्र सरकार ने न्यूनतम मजदूरी को लेकर कड़े नियम बना दिए हैं। अब कोई भी कंपनी सरकार द्वारा तय 'फ्लोर वेज' से कम सैलरी पर किसी को नौकरी पर नहीं रख सकती। यह नियम पूरे देश में एक समान रूप से लागू होगा, जिससे कर्मचारियों का शोषण रुकेगा।

नए नियमों के बाद हर कर्मचारी को न्यूनतम वेतन मिलना अब कानूनी अधिकार बन गया है। | Image source: Shutterstock
देश भर में नौकरी करने वालों के लिए एक बहुत ही राहत भरी खबर है। अब तक कई बार देखा जाता था कि कंपनियां या फैक्ट्री मालिक मंदी या काम की कमी का बहाना बनाकर कर्मचारियों को बेहद कम सैलरी पर काम करने के लिए मजबूर करते थे। लेकिन केंद्र सरकार के नए लेबर कोड यानी श्रम कानूनों ने इस मनमानी पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। सरकार ने 'न्यूनतम मजदूरी' (Minimum Wage) को लेकर जो नियम बनाए हैं, वो न केवल सख्त हैं बल्कि हर कर्मचारी को आर्थिक सुरक्षा की गारंटी भी देते हैं। अब कोई भी नियोक्ता या कंपनी सरकार द्वारा तय सीमा से कम सैलरी पर किसी को हायर नहीं कर सकती है।
इस नए बदलाव की सबसे बड़ी बात 'फ्लोर वेज' (Floor Wage) है। केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन की दर तय करेगी। इसे ही फ्लोर वेज कहा जाएगा। यह एक लक्ष्मण रेखा की तरह काम करेगा। इसका मतलब यह है कि भारत का कोई भी राज्य इस फ्लोर वेज से कम न्यूनतम मजदूरी तय नहीं कर सकता। अगर किसी राज्य में पहले से ही मजदूरी की दर इस फ्लोर वेज से ज्यादा है, तो वो उसे कम नहीं कर सकते। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, हर मजदूर और कर्मचारी को एक सम्मानजनक वेतन जरूर मिले। यह नियम संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों पर लागू होगा।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह रकम तय कैसे होती है। नए नियमों के मुताबिक, सरकार ने सैलरी तय करने के लिए कई पैमानों को आधार बनाया है। इसमें केवल पेट भरना ही शामिल नहीं है। सरकार ने माना है कि एक कर्मचारी की कमाई इतनी होनी चाहिए कि वह अपने परिवार के लिए भोजन, कपड़ा और मकान का खर्च उठा सके। इसके अलावा इसमें बच्चों की पढ़ाई, मेडिकल खर्च, बिजली-ईंधन और बुढ़ापे की सुरक्षा को भी जोड़ा गया है। इन सभी खर्चों को जोड़ने के बाद ही वह न्यूनतम आंकड़ा निकलता है, जो कंपनी को आपको देना ही होगा।
सरकार ने यह भी साफ किया है कि सबकी न्यूनतम मजदूरी एक जैसी नहीं हो सकती। इसे काम की कुशलता (Skill) और जगह (Geography) के आधार पर बांटा गया है। कर्मचारियों को चार कैटेगरी में रखा गया है, अकुशल (Unskilled), अर्ध-कुशल (Semi-Skilled), कुशल (Skilled) और अति-कुशल (Highly Skilled)। इसी तरह शहरों को भी मेट्रो, टियर-2 और ग्रामीण इलाकों में बांटा गया है। जाहिर है कि मेट्रो शहर में रहने वाले और कुशल काम करने वाले कर्मचारी की न्यूनतम मजदूरी, गांव में काम करने वाले अकुशल मजदूर से ज्यादा होगी। लेकिन दोनों ही सूरतों में यह सरकार द्वारा तय फ्लोर वेज से ऊपर ही होगी।
कंपनियों के लिए अब पुराने ढर्रे पर चलना मुश्किल होगा। पहले कई छोटी कंपनियां या ठेकेदार कागज पर कुछ और दिखाते थे और हाथ में कम पैसा देते थे। लेकिन अब वेतन संहिता के तहत डिजिटल पेमेंट और पारदर्शिता पर जोर दिया गया है। अगर कोई कंपनी नए नियमों का उल्लंघन करती है और तय न्यूनतम मजदूरी से कम पैसा देती है, तो इसे अपराध माना जाएगा। ऐसा करने पर कंपनी मालिक पर भारी जुर्माना लग सकता है और जेल भी हो सकती है। कर्मचारी अब अपनी कम सैलरी की शिकायत सीधे लेबर कोर्ट में कर सकते हैं और कानून उनका पूरा साथ देगा।
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