पर्सनल फाइनेंस
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4 min read | अपडेटेड March 27, 2026, 15:03 IST
सारांश
हेल्थ इंश्योरेंस रखने वाले मरीजों के लिए बड़ी राहत की खबर है। बीमा नियामक इरडा ने कैशलेस क्लेम के लिए नए समय की सीमा तय कर दी है। अब अस्पतालों को एक घंटे के भीतर इलाज की मंजूरी और तीन घंटे के भीतर छुट्टी की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इससे मरीजों का कीमती समय बचेगा।

अब हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम के लिए मरीजों को अस्पतालों के चक्कर नहीं काटने होंगे और इलाज में देरी नहीं होगी।
अगर आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है और आपको अस्पताल में इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है, तो यह खबर आपके लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आई है। बीमा नियामक इरडा (IRDAI) ने अब इलाज और अस्पताल से छुट्टी की प्रक्रिया को तेज करने के लिए बेहद सख्त नियम बना दिए हैं। अक्सर देखा जाता है कि अस्पताल में भर्ती होने के समय इंश्योरेंस कंपनी से मंजूरी मिलने में बहुत वक्त लग जाता है, जिससे मरीज और उसके परिवार को काफी परेशानी होती है। इसी समस्या को देखते हुए फाइनेंस मंत्रालय ने जानकारी दी है कि अब बीमा कंपनियों को कैशलेस क्लेम की प्रोसेसिंग के लिए एक तय समय सीमा का पालन करना होगा।
मरीजों को अस्पताल में भर्ती होने के दौरान होने वाली देरी से बचाने के लिए इरडा ने एक नया 'गोल्डन ऑवर' नियम बनाया है। इस नियम के तहत अब बीमा कंपनियों को कैशलेस प्री-ऑथराइजेशन के अनुरोध को सिर्फ एक घंटे के भीतर मंजूर करना होगा। यानी जैसे ही अस्पताल बीमा कंपनी को इलाज की जानकारी भेजेगा, कंपनी को एक घंटे में ओके कहना होगा। इसके अलावा, जब मरीज पूरी तरह ठीक होकर अस्पताल से घर जाने के लिए तैयार होगा, तो फाइनल ऑथराइजेशन यानी डिस्चार्ज की प्रक्रिया को अधिकतम तीन घंटे में पूरा करना होगा। इस टाइमलाइन को तय करने का असली मकसद यह है कि मरीज को समय पर इलाज मिले और उसे अस्पताल के बिलिंग काउंटर पर बेवजह घंटों खड़ा न होना पड़े।
एक तरफ जहां नियम आसान हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत में हेल्थ इंश्योरेंस लेने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2024-25 के आंकड़ों को देखें तो इस सेक्टर में करीब 9 पर्सेंट की शानदार ग्रोथ रेट देखी गई है। इस दौरान कुल हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम 1.2 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा का रहा है। सरकार का मानना है कि कोरोना के बाद से लोगों में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता काफी बढ़ी है। लोग अब मेडिकल खर्चों से सुरक्षा चाहते हैं और बेहतर हेल्थकेयर फाइनेंसिंग तक उनकी पहुंच आसान हुई है, जिसके कारण बाजार में हेल्थ इंश्योरेंस की मांग लगातार बढ़ रही है।
बीमा कंपनियों के काम करने के तरीके में भी काफी सुधार आया है। क्लेम सेटलमेंट रेशियो यानी कितने क्लेम पास किए गए, इसमें पिछले सालों के मुकाबले काफी बढ़त हुई है। वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 87.5 पर्सेंट तक पहुंच गया है, जबकि इससे पहले वाले साल में यह 82.46 पर्सेंट और उससे पहले 85.66 पर्सेंट था। इसके साथ ही शिकायतों के निपटारे के लिए 'बीमा भरोसा' पोर्टल बहुत अच्छा काम कर रहा है। वित्त वर्ष 2025 में करीब 1,37,361 शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें से 93 पर्सेंट शिकायतों का समाधान उसी साल के भीतर कर दिया गया। इससे पॉलिसीधारकों का भरोसा सिस्टम पर और ज्यादा मजबूत हुआ है।
प्रीमियम बढ़ने और क्लेम रिजेक्ट होने के कारण
हालांकि, कई लोग इस बात से परेशान हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम क्यों बढ़ रहा है। इसके कुछ मुख्य कारण हैं, जैसे पॉलिसीधारक की उम्र बढ़ना। उम्र के साथ बीमारी का रिस्क बढ़ जाता है, जिससे प्रीमियम महंगा होता है। साथ ही लोग अब गंभीर बीमारियों के लिए ज्यादा राशि (सम इंश्योर्ड) का बीमा ले रहे हैं और नई पॉलिसियों में ओपीडी और वेलनेस जैसे नए फीचर भी जुड़ गए हैं। दूसरी ओर, कुछ क्लेम आज भी रिजेक्ट हो जाते हैं। इसकी बड़ी वजह पॉलिसी की शर्तें होती हैं जैसे को-पेमेंट क्लॉज, सब-लिमिट्स और रूम रेंट कैपिंग। इसलिए कोई भी पॉलिसी लेने से पहले उसके नियमों को अच्छी तरह समझना जरूरी है ताकि बाद में क्लेम के समय कोई दिक्कत न आए।
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