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3 min read | अपडेटेड October 15, 2025, 08:49 IST
सारांश
बुधवार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट जारी रही और यह 5 महीने के निचले स्तर पर आ गईं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने 2026 में सप्लाई सरप्लस की चेतावनी दी है। वहीं, अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते तनाव से मांग में कमी की आशंका है, जिससे कीमतों पर दबाव बना है।

कच्चे तेल का बाजार आज दबाव में है।
Petrol-Diesel Rate: गाड़ी चलाने वालों के लिए एक राहत भरी खबर आ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आज, बुधवार को, बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट पिछले सेशन से जारी है और कीमतें अब 5 महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं। इस गिरावट के पीछे दो बड़ी वजहें काम कर रही हैं। पहली, भविष्य में तेल की सप्लाई जरूरत से ज्यादा होने की चेतावनी और दूसरी, दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता व्यापारिक तनाव, जिससे तेल की मांग घटने का डर पैदा हो गया है।
आज सुबह के कारोबार में, ब्रेंट क्रूड वायदा 12 सेंट गिरकर $62.27 प्रति बैरल पर आ गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) वायदा 10 सेंट की गिरावट के साथ $58.60 पर कारोबार कर रहा था। इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की ताजा रिपोर्ट है।
IEA ने मंगलवार को चेतावनी दी कि 2026 तक वैश्विक तेल बाजार में प्रति दिन 40 लाख बैरल तक का सरप्लस (जरूरत से ज्यादा सप्लाई) हो सकता है। यह एजेंसी के पिछले अनुमान से कहीं ज्यादा है। इसका सीधा मतलब है कि OPEC+ देश और उनके प्रतिद्वंद्वी मिलकर इतना तेल उत्पादन करेंगे कि दुनिया में उसकी खपत कम पड़ जाएगी। जब भी बाजार में किसी चीज की सप्लाई उसकी मांग से ज्यादा हो जाती है, तो उसकी कीमतें स्वाभाविक रूप से गिरने लगती हैं।
कीमतों पर दूसरा बड़ा दबाव अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती व्यापारिक जंग से आ रहा है। दोनों देशों ने एक-दूसरे के समुद्री जहाजों पर अतिरिक्त पोर्ट फीस लगानी शुरू कर दी है। इसके अलावा, बीजिंग ने दक्षिण कोरियाई शिपबिल्डर हानवा ओशन की पांच अमेरिकी-लिंक्ड सहायक कंपनियों पर प्रतिबंधों की घोषणा की है।
यह तनाव पिछले हफ्ते तब और बढ़ गया जब चीन ने रेयर अर्थ खनिजों के निर्यात पर नियंत्रण बढ़ाने का ऐलान किया और जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीनी सामानों पर टैरिफ को 100% तक बढ़ाने और सॉफ्टवेयर निर्यात पर प्रतिबंधों को सख्त करने की धमकी दी। जब दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस तरह लड़ती हैं, तो वैश्विक व्यापार धीमा हो जाता है, जिससे फैक्ट्रियों में उत्पादन कम होता है और ऊर्जा, यानी कच्चे तेल की मांग घट जाती है।
बाजार के विशेषज्ञ अब यह देख रहे हैं कि तेल की ओवरसप्लाई की स्थिति कितनी गंभीर है, जिसका अंदाजा वैश्विक इन्वेंट्री (तेल के भंडार) के आंकड़ों से लगेगा। इसी सिलसिले में, ट्रेडर्स अमेरिका के साप्ताहिक इन्वेंट्री डेटा का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। रॉयटर्स द्वारा किए गए एक शुरुआती पोल के अनुसार, विश्लेषकों का अनुमान है कि 10 अक्टूबर को समाप्त हुए सप्ताह में अमेरिकी कच्चे तेल के भंडार में लगभग 200,000 बैरल की वृद्धि हुई होगी, जबकि गैसोलीन और डिस्टिलेट के भंडार में गिरावट की संभावना है।
अगर कच्चे तेल का भंडार बढ़ता है, तो यह कीमतों पर और दबाव डालेगा। इस हफ्ते सोमवार को कोलंबस दिवस की छुट्टी के कारण, अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) की रिपोर्ट आज देर रात और अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) का आधिकारिक डेटा गुरुवार को जारी होगा।
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