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4 min read | अपडेटेड March 16, 2026, 13:28 IST
सारांश
मीडिल ईस्ट में युद्ध के कारण एलपीजी की सप्लाई पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में भारत ने 'डीएमई' (DME) के रूप में एक मजबूत विकल्प तैयार कर लिया है। यह स्वदेशी गैस मीथेनॉल से बनाई जाएगी। सबसे बड़ी राहत यह है कि इसके लिए आपको नया सिलेंडर या चूल्हा खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

भारत अब एलपीजी के विकल्प के तौर पर स्वदेशी 'डीएमई' गैस अपनाने की तैयारी में है।
पश्चिम एशिया यानी वेस्ट एशिया में चल रहे युद्ध ने पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस टकराव के कारण अब भारत में भी गैस के दाम बढ़ने और इसकी भारी किल्लत होने का डर सताने लगा है। आम आदमी के मन में यह सवाल उठना बहुत ही स्वाभाविक है कि अगर विदेशों से आने वाली रसोई गैस की सप्लाई रुक गई, तो घरों में खाना कैसे पकेगा? इस गंभीर समस्या को देखते हुए भारत सरकार ने एक बहुत ही मजबूत 'प्लान बी' पर अपना काम तेज कर दिया है। इस खास स्वदेशी योजना का नाम है डीएमई (DME), जो आने वाले समय में हमारी रसोई का नया साथी बन सकता है।
डीएमई का पूरा नाम डाई-मिथाइल ईथर है। यह एक विशेष प्रकार की गैस है जिसे मीथेनॉल की मदद से लैब में तैयार किया जाता है। इस ईंधन की सबसे बड़ी और अच्छी बात यह है कि इसे बनाने के लिए जिस मीथेनॉल की जरूरत पड़ती है, वह हमें बायोमास, कोयले और यहां तक कि हवा में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड से भी आसानी से मिल सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एलपीजी और डीएमई के केमिकल गुण आपस में काफी मिलते-जुलते हैं। इसी समानता की वजह से इसे घरों में खाना पकाने और ऊर्जा की दूसरी जरूरतों के लिए एक बेहतरीन और साफ-सुथरा विकल्प माना जा रहा है। इसे या तो सीधे इस्तेमाल किया जा सकता है या फिर एलपीजी के साथ मिलाकर भी काम में लाया जा सकता है।
जब भी किसी नए ईंधन या तकनीक की बात आती है, तो सबसे पहले मन में यही ख्याल आता है कि क्या इसके लिए नया चूल्हा या सिलेंडर खरीदना पड़ेगा? लेकिन डीएमई के मामले में जनता को ऐसा कोई भी आर्थिक बोझ नहीं उठाना पड़ेगा। कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि एलपीजी की जगह डीएमई का इस्तेमाल करने के लिए हमारे घरों के मौजूदा सिस्टम में किसी बड़े बदलाव की जरूरत नहीं है। आपके घर में जो सिलेंडर, रेगुलेटर, गैस पाइप और चूल्हे अभी इस्तेमाल हो रहे हैं, वे इस नई गैस के साथ भी बिल्कुल सामान्य तरीके से काम करेंगे। भारतीय मानक ब्यूरो यानी बीआईएस ने इसके लिए तकनीकी स्टैंडर्ड भी पहले ही तय कर दिए हैं, ताकि सुरक्षा को लेकर कोई कसर न रहे।
भारत अपनी जरूरत की रसोई गैस का एक बहुत बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से खरीदता है। जब भी दुनिया के किसी हिस्से में युद्ध या संघर्ष होता है, तो भारत की एनर्जी सिक्योरिटी खतरे में पड़ जाती है और गैस की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। मौजूदा ग्लोबल संकट ने यह साफ कर दिया है कि हमें अपने लोकल विकल्पों पर ध्यान देना ही होगा। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए CSIR, राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला यानी NCL के वैज्ञानिकों ने डीएमई का उत्पादन बड़े पैमाने पर करने के लिए कमर कस ली है। वहां हाल ही में एक पायलट प्लांट भी लगाया गया है और अब वैज्ञानिक इसके प्रोडक्शन को कई गुना बढ़ाने की योजना पर काम कर रहे हैं।
भारत के नीति निर्माताओं का मुख्य लक्ष्य एक ऐसा स्वदेशी विकल्प तैयार करना है, जो विदेशों से आने वाली एलपीजी पर हमारी निर्भरता को कम कर सके। अगर यह प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल होकर बड़े पैमाने पर लागू हो जाता है, तो इंटरनेशनल मार्केट में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर आम जनता की जेब पर नहीं पड़ेगा। यह पहल न केवल खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराएगी, बल्कि भविष्य की अनिश्चितताओं के बीच देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी। अब युद्ध चाहे कितना भी लंबा चले, भारत की रसोई में आंच धीमी नहीं पड़ेगी।
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