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  1. स्विगी या जोमैटो से एक गिग वर्कर की कितनी होती है कमाई? इस बार 31 दिसंबर को महा-हड़ताल करने की है तैयारी

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स्विगी या जोमैटो से एक गिग वर्कर की कितनी होती है कमाई? इस बार 31 दिसंबर को महा-हड़ताल करने की है तैयारी

Upstox

4 min read | अपडेटेड December 29, 2025, 13:59 IST

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सारांश

ऑनलाइन डिलीवरी और कैब सेवाओं ने हमारी जिंदगी आसान बना दी है, लेकिन इन्हें चलाने वाले गिग वर्कर्स आज संघर्ष कर रहे हैं। कम कमाई, लंबे काम के घंटे और 10 मिनट डिलीवरी के दबाव के कारण ये वर्कर्स 31 दिसंबर को देशव्यापी हड़ताल पर जा रहे हैं। एक स्टडी के अनुसार, अधिकांश वर्कर्स की मासिक आय 15,000 रुपये से भी कम है।

Zomato gig workers

गिग वर्कर्स ने हड़ताल करने की ठान ली है।

आज के डिजिटल दौर में मोबाइल पर एक क्लिक करते ही खाना, राशन या कैब घर के दरवाजे पर हाजिर हो जाती है। इस आधुनिक सुविधा ने आम आदमी की जिंदगी को बहुत आसान बना दिया है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे उन लाखों लोगों का पसीना है जिन्हें हम गिग वर्कर्स कहते हैं। ये वर्कर्स अपनी मांगों को लेकर बीते 25 दिसंबर को हड़ताल कर चुके हैं और अब 31 दिसंबर को भी बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं। मुख्य सवाल यह है कि जो लोग हमारी सुविधा के लिए दिन-रात एक करते हैं, उनके हालात इतने खराब क्यों हैं। असल में गिग वर्कर्स वे होते हैं जो किसी कंपनी में पक्के कर्मचारी नहीं होते, बल्कि एक स्वतंत्र ठेकेदार की तरह काम करते हैं। उन्हें लगता है कि उनके पास काम करने की आजादी है। गिग वर्कर्स को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, इसको लेकर अप्रैल 2022 से अप्रैल 2023 के बीच पीपल्स एसोसिएशन इन ग्रासरूट्स एक्शन एंड मूवमेंट्स ने एक स्टडी कंडक्ट करवाई थी। इस स्टडी में गिग वर्कर्स की तमाम समस्याओं को हाइलाइट किया गया था।

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काम के घंटों का कोई हिसाब नहीं

पीपल्स एसोसिएशन इन ग्रासरूट्स एक्शन एंड मूवमेंट्स और इंडियन फेडरेशन के स्टडी के मुताबिक, गिग वर्कर्स के काम करने का कोई तय समय नहीं है। जहां एक सामान्य दफ्तर में 8-9 घंटे काम होता है, वहीं ये डिलीवरी पार्टनर्स और ड्राइवर दिन में 10 से 14 घंटे तक काम करने को मजबूर हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि पीपल्स एसोसिएशन इन ग्रासरूट्स एक्शन एंड मूवमेंट्स की स्टडी में इस बात का जिक्र किया गया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति से आने वाले वर्कर्स की स्थिति और भी दयनीय है। उनमें से ज्यादातर लोग 14 घंटे से अधिक समय तक सड़क पर रहते हैं। इतनी मेहनत के बाद भी उन्हें वह सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल पाती जिसके वे हकदार हैं। यही वजह है कि अब वे नौकरी की सुरक्षा और बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांग कर रहे हैं।

कमाई और खर्च का बिगड़ता गणित

कमाई की बात करें तो आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। पीपल्स एसोसिएशन इन ग्रासरूट्स एक्शन एंड मूवमेंट्स की स्टडी बताती है कि लगभग 43 प्रतिशत गिग वर्कर्स दिन भर की भागदौड़ और खर्च काटने के बाद 500 रुपये भी नहीं बचा पाते। महीने भर की उनकी कुल कमाई 15,000 रुपये से भी कम रह जाती है। इसमें से 34 प्रतिशत लोग तो ऐसे हैं जो महीने में 10,000 रुपये का आंकड़ा भी नहीं छू पाते। हालांकि यहां ये बात ध्यान देने वाली है कि ये स्टडी अप्रैल 2022 से अप्रैल 2023 के बीच की गई थी। तब से लेकर अब तक चीजें बदली हैं। लेकिन अगर इस स्टडी को आधार माना जाए तो गिग वर्कर्स की कमाई काफी कम है। यह बात स्टडी में करीब 76 प्रतिशत डिलीवरी पार्टनर्स ने स्वीकार भी किया है कि उन्हें अपना घर चलाने में भारी परेशानी हो रही है और कई लोग तो अपनी कमाई से ज्यादा खर्च होने के कारण कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं।

कमीशन और सुरक्षा की अनदेखी

कंपनियों के कमीशन को लेकर भी वर्कर्स में काफी नाराजगी है। कंपनियां दावा करती हैं कि वे केवल 20 प्रतिशत हिस्सा काटती हैं, लेकिन ड्राइवरों का कहना है कि असलियत में हर राइड पर उनकी कमाई से 31 से 40 प्रतिशत तक हिस्सा काट लिया जाता है। इसके अलावा 10 मिनट में डिलीवरी देने वाली नई नीतियों ने उनकी जान को जोखिम में डाल दिया है। जल्दी पहुंचने के चक्कर में वे शारीरिक रूप से थक जाते हैं और सड़क हादसों का शिकार हो जाते हैं। कंपनियों की ओर से उन्हें कोई एक्सीडेंट इंश्योरेंस या पर्याप्त मेडिकल कवर भी नहीं मिलता है।

प्लेटफार्म की मनमानी है कारण?

स्टडी में कहा गया है कि गिग वर्कर्स को केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि मानसिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है। बिना किसी ठोस कारण के उनकी आईडी ब्लॉक कर दी जाती है, जिससे उनकी कमाई का जरिया रातों-रात छिन जाता है। इसके अलावा ग्राहकों के बुरे बर्ताव और तकनीकी खराबियों के कारण भी उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। इन तमाम मुद्दों पर कंपनियों की ओर से कोई सुनवाई नहीं होती है।

इन्हीं सब कारणों से तंग आकर अब इन वर्कर्स ने 31 दिसंबर को महा-हड़ताल का फैसला किया है ताकि सरकार और कंपनियां उनकी आवाज सुन सकें और उनके भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए कड़े कदम उठाएं।

डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल पीपल्स एसोसिएशन इन ग्रासरूट्स एक्शन एंड मूवमेंट्स और इंडियन फेडरेशन की स्टडी पर आधारित है, अपस्टॉक्स किसी भी व्यक्तिगत विचार या राय को न तो शामिल करता है और न ही उसका प्रचार करता है, यह आर्टिकल केवल सर्वे के निष्कर्षों को दर्शाता है।
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लेखकों के बारे में

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Upstox Hindi News Desk पत्रकारों की एक टीम है जो शेयर बाजारों, अर्थव्यवस्था, वस्तुओं, नवीनतम व्यावसायिक रुझानों और व्यक्तिगत वित्त को उत्साहपूर्वक कवर करती है।

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