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3 min read | अपडेटेड April 03, 2026, 12:43 IST
सारांश
अमेरिकी सरकार का कहना है कि इस कदम से अमेरिका में दवाइयों का उत्पादन बढ़ेगा और लोगों को सस्ती दवाइयां मिलेंगी। अब तक 12 से ज्यादा फार्मा कंपनियां इस नीति के तहत सरकार से समझौता कर चुकी हैं, जिसमें कीमतों में छूट और घरेलू निवेश के बदले उन्हें कुछ समय के लिए टैरिफ में राहत दी गई है।

Pharma: अगर कंपनियां अमेरिका में फैक्ट्री लगाती हैं और दवाइयां सस्ती करती हैं, तो उन्हें राहत मिल सकती है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने कुछ दवा बनाने वाली कंपनियों पर 100% तक टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। ये टैरिफ खास तौर पर उन कंपनियों पर लगाया जा रहा है जो सरकार की “Most Favored Nation” प्राइसिंग स्कीम में शामिल नहीं हुई हैं। इस स्कीम का मकसद है कि दवाइयों की कीमतें अमेरिका में कम हों और कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग अमेरिका में ही करें। यानी अगर कंपनियां अमेरिका में फैक्ट्री लगाती हैं और दवाइयां सस्ती करती हैं, तो उन्हें राहत मिल सकती है।
इस फैसले के तहत बड़ी फार्मा कंपनियों को 120 दिन और छोटी कंपनियों को 180 दिन का समय दिया गया है ताकि वे इस नई पॉलिसी के अनुसार खुद को ढाल सकें। अगर कोई कंपनी इस स्कीम में शामिल हो जाती है या अमेरिका में उत्पादन शुरू करने का वादा करती है, तो उसके लिए टैरिफ काफी कम हो सकता है, जैसे 100% से घटकर 20% तक। वहीं, यूरोपियन यूनियन, जापान, साउथ कोरिया और स्विट्जरलैंड जैसे देशों की कंपनियों पर लगभग 15% टैरिफ लगेगा, जबकि यूके की कंपनियों पर करीब 10%।
अमेरिकी सरकार का कहना है कि इस कदम से अमेरिका में दवाइयों का उत्पादन बढ़ेगा और लोगों को सस्ती दवाइयां मिलेंगी। अब तक 12 से ज्यादा फार्मा कंपनियां इस नीति के तहत सरकार से समझौता कर चुकी हैं, जिसमें कीमतों में छूट और घरेलू निवेश के बदले उन्हें कुछ समय के लिए टैरिफ में राहत दी गई है। यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की कुछ टैरिफ पावर को सीमित कर दिया था, और पहले दवाइयों पर ऐसे सख्त टैरिफ नहीं लगाए जाते थे।
ट्रंप की अपनी पार्टी के कुछ लोग भी इस बात से चिंतित हैं कि इतने ज्यादा टैरिफ लगाने से दवाइयां महंगी हो सकती हैं, खासकर ऐसे समय में जब पहले से ही महंगाई ज्यादा है। यानी सरकार का मकसद कीमतें कम करना है, लेकिन इसका उल्टा असर भी हो सकता है।
भारत की कंपनियों के लिए फिलहाल राहत है, क्योंकि US में जेनेरिक दवाओं को किसी भी तरह के टैरिफ से छूट दी गई है। भारत के कुल फार्मा एक्सपोर्ट में US की हिस्सेदारी 34% है। FY25 में, भारत का फार्मास्यूटिकल एक्सपोर्ट $30.47 बिलियन तक पहुंच गया, जिसमें सालाना आधार पर 9.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
अमेरिका ने जारी आदेश में कहा है कि जेनरिक फार्मास्यूटिकल्स और उनके इनग्रेडिएंट्स (जैसे APIs) को अभी Section 232 के तहत टैरिफ से बाहर रखा गया है। हालांकि, रिपोर्ट्स के मुताबिक US के कॉमर्स सेक्रेटरी अगले 1 साल तक फार्मा सेक्टर में जेनेरिक दवाओं के इंपोर्ट के मुख्य स्तरों की बारीकी से जांच करेंगे, ताकि आगे की रणनीति तय की जा सके।
डोनाल्ड ट्रंप ने स्टील, एल्युमिनियम और कॉपर जैसे मेटल्स पर भी नियम सख्त कर दिए हैं। नए नियमों के मुताबिक कच्चे मेटल पर लगने वाला मौजूदा 50% टैरिफ अब एक्सपोर्ट के समय घोषित कीमतों के बजाय, अमेरिका में उन मेटल की खरीद कीमतों के आधार पर तय किया जाएगा। सरकार का मानना है कि विदेशी कंपनियां कीमतों में हेरफेर करती हैं, जिसे रोकने के लिए ये कदम उठाया गया है।
ऐसे प्रोडक्ट्स जिनमें मेटल का इस्तेमाल ज्यादा है, जैसे घरेलू उपकरण (फ्रिज, वॉशिंग मशीन आदि) उन पर 25% टैरिफ लगेगा अगर उनमें मेटल का हिस्सा एक तय सीमा से ज्यादा है। हालांकि सरकार का कहना है कि इन फैसलों से आम लोगों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा और कीमतें नियंत्रण में रहेंगी, लेकिन असल असर आगे जाकर ही साफ होगा।
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