पर्सनल फाइनेंस

4 min read | अपडेटेड March 09, 2026, 14:31 IST
सारांश
RBI द्वारा प्रस्तावित नियमों के मुताबिक अगर फ्रॉड बैंक की लापरवाही से होता है, तो ग्राहक पर कोई जिम्मेदारी नहीं होगी और उसे पूरा मुआवजा मिलेगा। इसी तरह अगर किसी तीसरे पक्ष की वजह से धोखाधड़ी होती है और ग्राहक पांच दिनों के भीतर इसकी जानकारी दे देता है, तो भी ग्राहक पर कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

डिजिटल फ्रॉड पर RBI का बड़ा प्रस्ताव: पीड़ितों को मिल सकता है ₹25,000 तक मुआवजा
डिजिटल बैंकिंग फ्रॉड के लगातार बढ़ते मामलों के बीच आम लोगों के लिए राहत की खबर है। दरअसल, Reserve Bank of India यानी RBI ने बैंकिंग फ्रॉड के पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए एक नया प्रस्ताव पेश किया है। इस प्रस्ताव के तहत ग्राहकों को उनके नुकसान का 85 प्रतिशत तक मुआवजा मिल सकता है, लेकिन इसकी अधिकतम सीमा ₹25,000 होगी। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि मुआवजा ग्राहक को उसके जीवन में केवल एक बार ही मिल सकेगा।
इस प्रस्ताव की घोषणा पहली बार 6 फरवरी की मौद्रिक नीति बैठक के दौरान RBI गवर्नर Sanjay Malhotra ने की थी। RBI ने “Reserve Bank of India (Commercial Banks Responsible Business Conduct) Third Amendment Directions, 2026” नाम से ड्राफ्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ये नियम 1 जुलाई 2026 या उसके बाद होने वाले इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन पर लागू होंगे। आरबीआई ने इस ड्राफ्ट पर सभी हितधारकों से 6 अप्रैल 2026 तक सुझाव मांगे हैं।
प्रस्तावित नियमों के अनुसार जिन ग्राहकों को कुछ खास मामलों में फर्जी इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन के कारण ₹50000 तक का नुकसान होता है, उन्हें मुआवजा दिया जाएगा। ऐसे मामलों में पीड़ित ग्राहकों को उनके कुल नुकसान का 85 प्रतिशत या ₹25,000, जो भी कम होगा, उतना मुआवजा मिलेगा।
हालांकि यह मुआवजा ग्राहक अपने जीवन में केवल एक बार ही ले सकता है। इसके लिए जरूरी है कि ग्राहक फ्रॉड ट्रांजैक्शन की जानकारी 5 कैलेंडर दिनों के भीतर अपने बैंक को दे और साथ ही National Cyber Crime Reporting Portal या National Cyber Crime Helpline पर भी इसकी शिकायत दर्ज कराए।
अगर नुकसान ₹29,412 से कम है, तो 85 फीसदी के हिसाब से जो मुआवजा बनेगा, उसमें से 65 फीसदी रकम आरबीआई देगा। वहीं ग्राहक का बैंक और जिस बैंक खाते में पैसा गया है, वह बैंक 10-10 फीसदी का योगदान करेंगे।
अगर नुकसान ₹29,412 से लेकर ₹50,000 के बीच है, तो मुआवजे की अधिकतम सीमा ₹25,000 होगी। ऐसे मामलों में आरबीआई ₹19,118 का हिस्सा देगा, जबकि ग्राहक का बैंक और लाभार्थी बैंक ₹2,941-₹2,941 का योगदान करेंगे।
बैंकों को यह मुआवजा ग्राहक के आवेदन मिलने के पांच कैलेंडर दिनों के भीतर उसके खाते में जमा करना होगा। इसके बाद बैंक हर तिमाही में आरबीआई से उसके हिस्से की राशि वापस ले सकते हैं।
मुआवजा योजना के अलावा आरबीआई ने डिजिटल बैंकिंग में ग्राहकों की सुरक्षा से जुड़े नियमों में भी कई बड़े बदलाव प्रस्तावित किए हैं। नए ड्राफ्ट में अधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन की परिभाषा को बढ़ाया गया है। इसमें ऐसे भुगतान भी शामिल होंगे जिन्हें ओटीपी, पिन, सीवीवी, पासवर्ड या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक ऑथेंटिकेशन के जरिए मंजूरी दी गई हो।
इस फ्रेमवर्क में ऐसे मामलों को भी शामिल किया गया है, जहां ग्राहक को धोखा देकर पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं। जैसे कोई ठग खुद को असली व्यक्ति या संस्था बताकर पैसे मंगवा ले या दबाव बनाकर ट्रांजैक्शन की मंजूरी ले ले।
आरबीआई ने “फ्रॉडुलेंट इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन” नाम से एक नई श्रेणी भी बनाई है। इसमें ऐसे दोनों तरह के मामले शामिल होंगे—जहां ग्राहक की अनुमति के बिना ट्रांजैक्शन हुआ हो और जहां ग्राहक से धोखे से ट्रांजैक्शन करवाया गया हो।
ड्राफ्ट नियमों में यह भी बताया गया है कि फ्रॉड के मामलों में बैंक और ग्राहक की लापरवाही क्या मानी जाएगी। बैंक की लापरवाही में जरूरी सुरक्षा सिस्टम लागू न करना, ट्रांजैक्शन अलर्ट न भेजना, शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था न होना या शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई में देरी करना शामिल हो सकता है।
वहीं ग्राहक की लापरवाही में ओटीपी या पिन जैसी गोपनीय जानकारी साझा करना, स्कैम से जुड़ी चेतावनियों को नजरअंदाज करना, समय पर फ्रॉड की जानकारी न देना या किसी नुकसानदायक ऐप को डाउनलोड करना शामिल है।
प्रस्तावित नियमों के मुताबिक अगर फ्रॉड बैंक की लापरवाही से होता है, तो ग्राहक पर कोई जिम्मेदारी नहीं होगी और उसे पूरा मुआवजा मिलेगा। इसी तरह अगर किसी तीसरे पक्ष की वजह से धोखाधड़ी होती है और ग्राहक पांच दिनों के भीतर इसकी जानकारी दे देता है, तो भी ग्राहक पर कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।
इसके अलावा बैंकों को ₹500 से ज्यादा के हर इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन पर तुरंत एसएमएस अलर्ट भेजना होगा और फ्रॉड या भुगतान साधनों के खोने की शिकायत दर्ज कराने के लिए 24 घंटे की सुविधा देनी होगी।
बैंकों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे ग्राहकों की शिकायतों का निपटारा करें और फ्रॉड के मामलों में जिम्मेदारी तय करें। इसके लिए समय सीमा उनकी नीति में तय होगी, लेकिन यह 30 कैलेंडर दिनों से ज्यादा नहीं हो सकती।
संबंधित समाचार
लेखकों के बारे में

अगला लेख