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  1. फॉर्म 134 और फॉर्म 135 ने क्यों ली पुराने फॉर्म 49B की जगह? भरते हैं टैक्स तो तुरंत जान लें जरूरी डीटेल

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फॉर्म 134 और फॉर्म 135 ने क्यों ली पुराने फॉर्म 49B की जगह? भरते हैं टैक्स तो तुरंत जान लें जरूरी डीटेल

Upstox

4 min read | अपडेटेड April 13, 2026, 14:08 IST

सारांश

टैक्स कंप्लायंस को आसान बनाने के लिए आयकर विभाग ने बिजनेस प्रोसेस री-इंजीनियरिंग की है। नए सिस्टम में प्री-फिल्ड डेटा और तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल होगा। अब सरकारी और गैर-सरकारी आवेदकों को अलग-अलग फॉर्म भरने होंगे।

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आयकर विभाग के नए फॉर्म 134 और 135 से अब टैक्स प्रक्रिया होगी और भी आसान।

देश के टैक्सपेयर्स और टैक्स प्रोफेशनल के लिए एक बड़ी खबर है। आयकर विभाग ने टैक्स से जुड़ी प्रक्रियाओं को और भी सरल और सटीक बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। विभाग ने दशकों से चले आ रहे पुराने फॉर्म 49B को अब पूरी तरह से खत्म कर दिया है। इसकी जगह अब दो नए और आधुनिक फॉर्म पेश किए गए हैं, जिन्हें फॉर्म 134 और फॉर्म 135 का नाम दिया गया है। यह नया नियम 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में प्रभावी हो चुका है। विभाग का मानना है कि इस बदलाव से उन लोगों को बहुत राहत मिलेगी जिन्हें पहले एक ही फॉर्म में उलझना पड़ता था।

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आखिर क्यों हुआ यह बड़ा बदलाव?

पुराना फॉर्म 49B सभी तरह के आवेदकों के लिए एक समान था। चाहे वह कोई सरकारी दफ्तर हो या कोई छोटी फर्म, सबको एक ही फॉर्म भरना पड़ता था। इससे अक्सर भ्रम की स्थिति पैदा होती थी और आवेदन में गलतियां होने की गुंजाइश ज्यादा रहती थी। नए आयकर नियम 2026 के तहत विभाग ने अपनी पूरी कार्यप्रणाली में सुधार किया है। इस सुधार का मुख्य उद्देश्य सरल भाषा का इस्तेमाल करना और तकनीक की मदद से टैक्स कंप्लायंस को आसान बनाना है। नए फॉर्म्स को इस तरह तैयार किया गया है कि वे पहले से भरे हुए यानी प्री-फिल्ड फॉर्मेट में होंगे, जिससे समय की बचत होगी।

फॉर्म 134 और 135 में क्या है अंतर?

आयकर विभाग ने अब आवेदकों को दो मुख्य कैटेगरी में बांट दिया है। पहली कैटेगरी सरकारी संस्थाओं की है, जिनके लिए फॉर्म नंबर 134 तैयार किया गया है। इस फॉर्म में सरकारी विभागों के स्पेशल केवाईसी और कार्यालय के विवरणों पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। दूसरी कैटेगरी में उन सभी लोगों और संस्थाओं को रखा गया है जो सरकारी नहीं हैं। इसमें सामान्य व्यक्ति, हिंदू अविभाजित परिवार यानी HUF, एलएलपी, पार्टनरशिप फर्म और सभी कंपनियां शामिल हैं। इन गैर-सरकारी आवेदकों को अब फॉर्म नंबर 135 भरना होगा। इससे आवेदन प्रक्रिया पहले के मुकाबले ज्यादा सटीक और तेज हो जाएगी।

नए फॉर्म्स में जानकारियां देना हुआ जरूरी

इन नए फॉर्म्स को बहुत ही सोच-समझकर डिजाइन किया गया है। सरकारी कैटेगरी यानी फॉर्म 134 को दो हिस्सों में बांटा गया है। इसके भाग 'ए' में कार्यालय की जानकारी और अकाउंट ऑफिस आइडेंटिफिकेशन नंबर यानी AIN जैसे जरूरी डीटेल भरने होंगे। वहीं गैर-सरकारी कैटेगरी वाले फॉर्म 135 में आवेदक को अपनी सही कैटेगरी चुननी होगी। इसमें पैन, राष्ट्रीयता, ईमेल और मोबाइल नंबर देना अनिवार्य कर दिया गया है। अब आवेदकों को सिर्फ वही जानकारी देनी होगी जो उनकी कैटेगरी के लिए वास्तव में जरूरी है, जिससे बेवजह का कागजी काम कम हो जाएगा।

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए विभाग ने कुछ डेटा पॉइंट्स को भी अनिवार्य कर दिया है। अब सरकारी संस्थाओं के अलावा अन्य सभी के लिए पैन नंबर देना जरूरी है ताकि पैन-टैन मैपिंग को बेहतर बनाया जा सके। इसके अलावा LLP के लिए रजिस्ट्रेशन नंबर और कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट आइडेंटिटी नंबर यानी CIN देना अब अनिवार्य होगा। जन्मतिथि और स्थापना की तारीख वाले कॉलम को भी अब और ज्यादा स्पष्ट कर दिया गया है। इन सख्त नियमों का फायदा यह होगा कि केवल असली आवेदकों को ही टैन मिलेगा और डेटा में हेरफेर की संभावना खत्म हो जाएगी।

टैक्सपेयर्स के लिए कैसे फायदेमंद है नई व्यवस्था?

इस नई व्यवस्था से टैक्सपेयर्स को कई तरह के फायदे होंगे। सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब दो अलग फॉर्म होने से किसी भी तरह का भ्रम नहीं रहेगा। फोकस्ड फॉर्म होने की वजह से वेरिफिकेशन का काम जल्दी पूरा होगा और टैन अलॉटमेंट की प्रोसेस में तेजी आएगी। गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए पहचान पत्र और पते का प्रमाण देना अनिवार्य होने से सिस्टम में मजबूती आएगी। वहीं सरकारी आवेदकों के लिए भी सर्टिफिकेट देना जरूरी कर दिया गया है, जो उनकी विश्वसनीयता को पक्का करता है।

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