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4 min read | अपडेटेड January 04, 2026, 11:18 IST
सारांश
नए साल 2026 की शुरुआत वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले के साथ हुई है। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देश में से एक पर इस सैन्य कार्रवाई ने वैश्विक बाजार में हलचल मचा दी है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि इससे महंगाई और ब्याज दरों पर सीधा असर पड़ सकता है।

वेनेजुएला के पास 303.22 अरब बैरल कच्चा तेल मौजूद है।
अभी दुनिया नए साल के स्वागत में डूबी ही थी कि 3 जनवरी 2026 की सुबह एक ऐसी खबर आई जिसने सबको सन्न कर दिया। वेनेजुएला की राजधानी काराकास से आती डरावनी तस्वीरों ने यह साफ कर दिया कि अमेरिका के साथ उसका पुराना विवाद अब एक खतरनाक मोड़ ले चुका है। राजधानी में हुए धमाकों और आसमान में गरजते लड़ाकू विमानों ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। यह सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है बल्कि इसका असर हर उस व्यक्ति पर पड़ने वाला है जो अपनी गाड़ी में पेट्रोल डलवाता है या शेयर बाजार में निवेश करता है। भारत जैसे देश के लिए यह खबर और भी गंभीर है क्योंकि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था तेल की कीमतों से गहराई से जुड़ी हुई है।
3 जनवरी की आधी रात के बाद काराकास और उसके पड़ोसी इलाके धमाकों की गूंज से दहल उठे। वेनेजुएला की सरकार ने इस घटना को अमेरिकी सेना की बड़ी गुंडागर्दी करार देते हुए पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया है। अमेरिका की ओर से भी इस बात की पुष्टि की गई है कि उनके विमानों ने वेनेजुएला के अंदरूनी हिस्सों में ठिकानों को निशाना बनाया है। हालांकि राहत की बात यह रही कि अभी तक तेल निकालने वाले बड़े केंद्रों या बंदरगाहों को भारी नुकसान पहुंचने की पक्की जानकारी नहीं मिली है। लेकिन तनाव जिस कदर बढ़ रहा है उससे तेल की वैश्विक सप्लाई चेन के टूटने का डर हर किसी को सता रहा है।
इस पूरी घटना के केंद्र में वेनेजुएला का वह विशाल तेल भंडार है जो इसे दुनिया का सबसे ताकतवर देश बना सकता था। वर्ल्डवाइड रिजर्व एंड प्रोडक्शन की ऑयल एंड गैस जर्नल 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, वेनेजुएला के पास 303.22 अरब बैरल का प्रमाणित तेल भंडार है जो सऊदी अरब के 267 अरब बैरल से भी कहीं अधिक है। इतनी बड़ी दौलत होने के बावजूद वहां की जनता गरीबी और महंगाई से जूझ रही है। अमेरिका और वेनेजुएला की दुश्मनी दशकों पुरानी है जो निकोलस मादुरो के समय में और ज्यादा बढ़ गई। अमेरिका उन जहाजों पर लगातार नजर रख रहा था जो चोरी-छिपे तेल की तस्करी कर रहे थे। पिछले महीने के अंत में हुआ छोटा हमला इसी बड़ी कार्रवाई की एक चेतावनी मात्र था।
दुनिया भर के निवेशक इस समय तीन मोर्चों पर नजर गड़ाए हुए हैं। पहला है कच्चे तेल की चाल। 2 जनवरी 2026 को बाजार बंद होने तक ब्रेंट क्रूड 60.7 डॉलर प्रति बैरल पर था। अगर सप्लाई रुकती है तो कीमतों में 5 से 10 डॉलर का उछाल तुरंत दिख सकता है। दूसरा बड़ा असर महंगाई और ब्याज दरों पर पड़ेगा। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ेगी जिससे ब्याज दरों में कटौती का इंतजार और लंबा हो सकता है। तीसरा असर सुरक्षित निवेश पर होगा जहां निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर सोना या डॉलर में लगाने लगते हैं।
भारत के नजरिए से देखें तो यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है। हम अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदते हैं। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 10 डॉलर भी बढ़ती हैं तो हमारे देश का पूरा आर्थिक समीकरण बिगड़ जाता है। इससे न केवल पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ेंगे बल्कि रुपए की कीमत में भी गिरावट आएगी। शेयर बाजार के निवेशक इस समय काफी डरे हुए हैं क्योंकि तेल महंगा होने का मतलब है कि कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी और उनका मुनाफा कम होगा। खासकर पेंट और विमानन कंपनियों के लिए यह समय बहुत चुनौतीपूर्ण होने वाला है क्योंकि उनका सबसे बड़ा खर्च तेल ही होता है।
आने वाले दिनों में बाजार की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि यह संघर्ष कितना लंबा खिंचता है। अगर यह हमला केवल एक चेतावनी तक सीमित रहता है तो शायद बाजार जल्द ही पटरी पर लौट आए। लेकिन अगर यह एक पूर्ण युद्ध का रूप ले लेता है और तेल की सप्लाई पूरी तरह ठप हो जाती है तो कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर के पार भी जा सकती हैं। ऐसी स्थिति में डिफेंस और सरकारी तेल उत्पादक कंपनियों को तेल महंगा होने से सीधा फायदा होता है। वहीं सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की चमक एक बार फिर बढ़ सकती है।
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