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3 min read | अपडेटेड April 06, 2026, 10:36 IST
सारांश
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक आज से शुरू हो गई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ग्लोबल अनिश्चितता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए आरबीआई रेपो रेट को 5.25 पर्सेट पर ही बरकरार रख सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक आज से शुरू हो गई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ग्लोबल अनिश्चितता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए आरबीआई रेपो रेट को 5.25 पर्सेट पर ही बरकरार रख सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिनों तक चलने वाली अहम बैठक आज से शुरू हो गई है। बाजार के एक्सपर्ट्स और इकोनॉमिस्ट्स को पूरी उम्मीद है कि इस बार केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा। ग्लोबल लेवल पर चल रही उथल-पुथल और पश्चिम एशिया के युद्ध की वजह से आरबीआई फिलहाल इंतजार करने की स्थिति में रह सकता है। रेपो रेट को 5.25 पर्सेट पर ही स्थिर रखे जाने की पूरी संभावना जताई जा रही है। इस बैठक में लिए गए फैसलों का ऐलान बुधवार 8 अप्रैल को किया जाएगा।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। तेल की इन बढ़ती कीमतों का सीधा असर भारत में महंगाई पर पड़ सकता है। अनुमान के मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है, तो इससे महंगाई करीब 0.60 पर्सेट तक बढ़ सकती है। फरवरी के बाद से तेल की कीमतों में आई अचानक तेजी ने आरबीआई की चिंता बढ़ा दी है। इसके अलावा, "सुपर एल नीनो" के खतरे से भी आने वाले समय में महंगाई बढ़ने का डर सता रहा है, जिससे खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं।
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी कमजोर होकर 93 के लेवल के पार चला गया है। एसबीआई के चीफ इकोनॉमिस्ट सौम्य कांति घोष के मुताबिक, भारत इस समय ग्लोबल क्राइसिस से अछूता नहीं है और यहां भी इसका असर महसूस किया जा रहा है। रुपये का गिरना और तेल का महंगा होना "इंपोर्टेड महंगाई" को बढ़ावा दे रहा है। यही वजह है कि आरबीआई इस समय ब्याज दरें घटाने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा। दुनिया भर के बाजारों में मची हलचल को देखते हुए केंद्रीय बैंक का पूरा ध्यान फिलहाल महंगाई को कंट्रोल करने पर रहने वाला है।
इक्रा की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर का कहना है कि कच्चे तेल और ग्लोबल हालातों को देखते हुए आरबीआई अप्रैल की इस पॉलिसी में दरों को जस का तस छोड़ सकता है। हालांकि, रिटेल महंगाई पिछले कुछ महीनों में 4 पर्सेट के टारगेट के करीब आई है, लेकिन तेल की वजह से ट्रांसपोर्ट और कोर महंगाई बढ़ने का खतरा अभी टला नहीं है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मदन सबनवीस का मानना है कि दरों में बदलाव न होने के बावजूद, आरबीआई की ओर से जारी होने वाला जीडीपी और महंगाई का नया अनुमान बहुत महत्वपूर्ण होगा। इनवेस्टर्स को इस बात का इंतजार है कि आरबीआई आने वाले समय के लिए क्या संकेत देता है।
आरबीआई ने पिछले साल फरवरी से अब तक रेपो रेट में कुल 1.25 पर्सेट की कटौती की है। लेकिन इसके बाद अगस्त, अक्टूबर और फरवरी 2026 की मीटिंग्स में दरों को जस का तस रखा गया है। एक्सपर्ट्स को उम्मीद है कि इस बार भी एमपीसी अपने "न्यूट्रल" रुख को बरकरार रखेगी। इससे फ्यूचर में महंगाई और ग्लोबल रिस्क को देखते हुए फैसले लेने की गुंजाइश बनी रहेगी। फिलहाल ऐसा लग रहा है कि केंद्रीय बैंक का फोकस ग्रोथ को सपोर्ट करने के बजाय महंगाई के खतरों को मैनेज करने पर ज्यादा रहेगा। अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो आरबीआई इस साल के लिए अपने महंगाई के अनुमान को बढ़ा भी सकता है।
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