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मुंबई हो या हैदराबाद, दिल्ली या चेन्नई, मूसलाधार बारिश के बाद देश के इन मेट्रो सिटीज में मिनटों में ही बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाते हैं।
एक स्टडी के मुताबिक साल 2030 तक दुनिया का 40% शहरी हिस्सा हाई-फ्रीक्वेंसी बाढ़ के जोन में आ जाएगा।
इससे जान-माल, इन्फ्रास्ट्रक्चर- एक शहर के हर पहलू को नुकसान होता है और क्लाइमेट चेंज इसे और बढ़ाता है।
शहरों के विस्तार, आबादी में इजाफे और मौसम के बदलते तेवर जैसी चुनौतियों का जवाब बनकर उभर रही हैं स्पंज सिटीज।
जैसा नाम से पता लगता है, ये ऐसे शहर होते हैं जहां प्लानिंग, डिजाइन और कंस्ट्रक्शन पानी को सोखने पर केंद्रित होता है।
इसके लिए शहरों में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाए जाते हैं, घास के मैदान, पार्क, झील बनाई जाती हैं।
इससे बारिश का पानी जमीन के अंदर डायरेक्ट किया जाता है बजाय सीमेंट की नालियों के रास्ते गटर में जाने के।
शहरों को स्पंजी बनाने के लिए पानी सोखने वाले मटीरियल्स के ज्यादा इस्तेमाल से लेकर सड़कों के किनारे घास की पट्टियों जैसे छोटे-छोटे कदम भी काम आते हैं।
सतत विकास से जुड़े एक्सपर्ट्स सलूशन देने वाली कंसल्टंसी Arup शहरों में ‘स्पंज’ क्वॉलिटी को आंकती है।
इसकी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मुंबई सबसे स्पंजी शहर है। यहां ग्रीन-ब्लू अर्बन स्पेस का एक बड़ा हिस्सा है। खासकर इमारतों के बीच में यहां बड़ी संख्या में पेड़ मौजूद हैं।
मुंबई के अलावा ऑकलैंड, नैरोबी, टोरंटो, सिंगापुर, न्यूयॉर्क, शांघाई, लंदन और सिडनी जैसे शहरों को भी स्पंज सिटी माना जाता है।
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