भारत में जन्मा शतरंज, यूं काबिज की पूरी दुनिया पर बादशाहत

2 जून 2025

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विश्वनाथन आनंद, दिब्येंदू बरुआ, कोनेरू हंपी, पी हरिकृष्ण, विदित गुजराती और डी गुकेश… ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने शतरंज के खेल में भारत की बादशाहत कायम की है।

साल 2024 में 19 साल के गुकेश डी वर्ल्ड चैंपियन बने और एक साल बाद उन्होंने 5 बार वर्ल्ड चैंपियन रहे मैग्नस कार्लसन को शिकस्त दी तो दुनिया दंग रह गई।

हालांकि, शतरंज की बिसात पर बाजी मारने में भारतीयों की तेजी हैरान करने वाली नहीं है क्योंकि यही वह जमीन है जहां इस खेल ने जन्म लिया था।

सदियों से पश्चिमी देशों में ‘चेस’ के नाम से मशहूर यह खेल हजारों साल पहले भारत में ‘चतुरंग’ नाम से प्रचलित था।

माना जाता है कि यह 1300-1500 साल पुराना खेल है। इसका जिक्र महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों में भी मिलता है।

‘चतुरंग’ यानी एक सेना के चार सबसे महत्वपूर्ण अंग- हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सिपाही। ये मिलकर दुश्मन की सेना और उसके राजा को मात देने के लिए बिसात बिछाते थे।

भारत से निकलकर चतुरंग अरब से लेकर दक्षिणपूर्व एशिया में पहुंचा जहां इसने जापान (शोगी) और चीन में अलग शक्ल इख्तियार की।

जब अरब शासकों ने स्पेन पर कब्जा किया तो इस खेल ने यूरोप में कदम जमाने शुरू किए। धीरे-धीरे ये यूरोप में फैलता गया।

इसी के साथ इसके मोहरों के नाम भी बदलते गए। राजा ‘शाह’ हुआ और उसे हराने को ‘शाह-मात’ नाम मिला। यूरोप में इसे ‘बिशप’ का मोहरा मिल गया।

रूस में तो यह 1917 की क्रांति के बाद से इस तरह मशहूर हुआ कि इसके लिए सरकारी स्कूल तक खुलने लगे। इससे रूस का इस खेल पर दबदबा भी कायम हुआ।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चेस का पहला टूर्नामेंट 1851 में लंदन टूर्नी हुआ जिसे जर्मनी के अडॉल्फ ऐंडरसन ने जीता। हालांकि, उन्हें ना ही कोई अवॉर्ड मिला और ना कोई टाइटल।

करीब 15 साल बाद पहली बार हुई वर्ल्ड चेस चैंपियनशिप में दुनिया को मिला पहला विश्व चैंपियन- विलहेम स्टाइनिट्ज।

इस खेल पर भारत की बादशाहत फिर से कायम की 1988 में ग्रैंडमास्टर बने विश्वनाथन आनंद ने जिन्होंने साल 2000 में देश को दिलाया पहला वर्ल्ड चेस चैंपियनशिप का खिताब।

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