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अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन से लेकर चांद पर बेस बनाने तक, दुनियाभर के देशों का इरादा अंतरिक्ष में ठिकाना तैयार करने का है।
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कई ऐसे उपकरण होते हैं जो या तो धरती से ले जाने में काफी भारी होते हैं और ईंधन इस्तेमाल करते हैं, या इतने संवेदनशील कि इनका सही सलामत पहुंचना ही मुश्किल।
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इसलिए अंतरिक्ष में स्थायी बेस पर इमारतें और बड़े उपकरण तैयार करने के लिए कई नई टेक्नॉलजी डेवलप की जा रही हैं। यहां नजर डालते हैं ऐसी 5 तकनीकों पर…
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एक साथ जटिल उपकरण, बड़े हिस्से बनाने की जगह मॉड्यूल्स बनाकर उन्हें असेंबल किया जाता है। इन मॉड्यूल्स को धरती से ले जाया भी जा सकता है और स्पेस में बनाया भी जा सकता है।
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कुछ हिस्सों को कॉम्पैक्ट फॉर्म में अंतरिक्ष तक ले जाकर फिर वहां हवा भरकर बड़ा आकार दिया जा सकता है। इससे इन्हें ले जाने में वजन और ईंधन की खपत कम होगी।
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छोटे मिशन पर जल्द निर्माण करने में 3D प्रिंटिंग तकनीक कारगर साबित होती है। ये तब खास जरूरी साबित होती है जब अचानक किसी ऐसी चीज की जरूरत पड़े जो पहले से पास ना हो।
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रेडिएशन, ग्रहों, उपग्रहों के मौसम, तापमान के मुताबिक खास मटीरियल का इस्तेमाल होता है। मंगल पर वेक्ट्रन, पॉलीकार्बोनेट, ऑर्थोफैब्रिक को टेस्ट किया गया है।
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स्पेस में निर्माण के लिए पॉलिमर्स डिवेलप किए जा रहे हैं और भविष्य में हो सकता है एल्युमिनियम, ग्रैफीन, चांद की मिट्टी से कॉन्क्रीट का इस्तेमाल होने लगे।
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सबसे जरूरी है किसी एलियन माहौल में ऐस्ट्रोनॉट्स की सेफ्टी। रोबोट के इस्तेमाल से ऐस्ट्रोनॉट्स सुरक्षित रहते हैं और उनपर रेडिएशन का असर कम होता है।
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साथ ही रोबोटिक आर्म अनजान चीजों को हैंडल कर सकते हैं जबकि जटिल, पतली जगहों पर आसानी से जा सकते हैं, जो ऐस्ट्रोनॉट्स के लिए मुश्किल हो सकता है।
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